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Saturday, 12 August 2023

आमुक्ति का करिश्मा: पात्र परिचय: भाग १

 





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सीमा:

सीमा एक उच्च शिक्षित आत्मनिर्भर लड़की हैं, जो अपने मूलस्थान दुर्ग से दूर तिरुवनंतपुरम बैंक में नौकरी करने गयी थी| और ये कथा उसके साथ वहा जो हुआ उससे शुरू होती हैं|

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करिश्मा:

करिश्मा सीमा की सहेली बनकर उसके जीवन में आती हैं, जो की वास्तव में सीमा से शुरू में बैर रखती हैं| पर सीमा के प्रेमपूर्ण और मिलनसार स्वाभाव के कारण वो अपने मन का बैर भूलकर सही मार्ग पर लौट आती हैं|

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उर्मिला:

उर्मिला सीमा की माँ हैं और वो सीमा की हर बात की खबर रखने का पूरा प्रयास करते रहती हैं| उर्मिला जो भी सीमा से पूछे सीमा बिना संकोच किये सब सच सच उर्मिला को बताती थी| यही माँ बेटी के नाते का मर्म हैं|

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Monday, 7 August 2023

बुरी संगति

नन्दन वन में एक सिंह रहता था। उसके तीन नौकर थे-कौआ, सियार और बाघ। सिंह उन तीनों के साथ एक गुफ़ा में रहता था। उसके नौकर चालाकी से वन के जीव जन्तुओं को सिंह के पास लाते और सिंह उसे मार डालता | फिर सबसे पहले सिंह उस जीव को खाता, फिर बाघ उसके बाद सियार और फिर कौआ!

सिंह का नौकर कौआ भी अत्यन्त अधिक चालाक और पाखण्डी था। वन के जीव-जन्तुओं को धोखे से सिंह के पास लाने में उस कौवे का महत्त्वपूर्ण योगदान होता, अतः वह अपने मालिक को सबसे ज्यादा प्रिय था। वह बिना रोक-टोक के सिंह से बात कर सकता था और उसे सलाह भी दे सकता था।

एक दिन वह कौआ सिंह के लिए किसी जीव की खोज में वन में घूम रहा था, कि अचानक उंसकी निगाह एक ऊँट पर गई। वह ऊँट एक पेड़ के नीचे बैठा रो रहा था।

ऊट को देखकर उसके दिमाग में एक विचार आया कि यदि यह ऊँट फंस जाए तो कई दिन के भोजन का इन्तजाम हो जाएगा। यह सोचकर उस वह ऊंट के पास गया और बोला -“ऊँट भाई! तुम इस वन में कैसे? तुम तो इन्सानों के पास रहते हो?”

ऊँट और जोर से रोने लगा, फिर चुप होकर बोला-“क्या बताऊँ भाई, मैं अपने मालिक के साथ इस वन से गुजर रहा था कि रास्ते में उनसे बिछड़ गया और तब से इसी पेड़ के नीचे बैठा अपनी किस्मत को रो रहा हूँ।” कहकर वह पुनः रोने लगा।

“तुम चिन्ता मत करो ऊँट भाई, मैं तुम्हें एक ऐसे स्थान पर ले जाऊंगा । जहाँ तुम आराम से जीवन व्यतीत कर सको!” कौए ने कहा। मगर ऊट बोला – “नहीं भाई, मैं यहीं ठीक हूँ, पास की घास-फूस खाकर अपना जीवन व्यतीत कर लुगा, तुम चिन्ता मत करो!”

ऊंट की बात सुनकर कौआ सोचने लगा कि अब उसे कैसे फंसाए? सोचते-सोचते उसके दिमाग में एक युक्ति आ ही गयी, वह बोला- ‘मगर ऊंट भाई, तुम यहाँ के लिए अन्जान हो, तुम नहीं जानते कि इस वन में एक जालिम सिंह  रहता है, वह किसी पर रहम नहीं करता और नए जानवर को तो वह छोड़ता ही नहीं, यदि उसे मालूम हो गया कि तुम यहाँ पंर नए आए हो तो वह तुम्हें छोड़ेगा नहीं, वह तुम्हें मार डालेगा ।”

कौए की बात सुनकर ऊँट सोच में पड़ गया। वह बोला- फिर तुम कैसे रहते हो भाई, उसने तुम्हें कभी कुछ नहीं कहा?” उसके स्वर में आश्चर्य भी था।

ऊँट की सुनकर कौआ कुटिल मुस्कान मुस्कराकर बोला-“ऊँट भाई! मैं उसी सिंह का नौकर हूँ, मेरे अलावा दो नौकर और हैं, सियार और बाघ ।” 

“क्या, तुम सिंह के यहां नौकर हो?” ऊँट ने आश्चर्य से कहा। उसे कौओं की बात पर विश्वास आ गया था।

“हाँ मेरे भाई, तभी तो मैं जिन्दा हु, अगर तुम भी मरना नहीं चाहते तो मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें सिंह के यहाँ नौकरी दिला दुगा।”

ऊँट फिर से सोच में पड़ गया।

तभी संयोगवश उधर से सियार और बाघ गुजरे, वे भी किसी शिकार की खोज में निकले थे। कौए ने उन्हें देखते ही एक और युक्ति भिड़ाई। वह फिर ऊँट से बोला- देखो ऊंट भाई, यह वे दोनों हैं, जो सिंह के यह नौकरी करते हैं।”

ऊँट ने कौए की बात की सच्चाई परखने के लिए बांघ और सियार को रोककर पूछा- “क्यों भाई, यह कौआ जो कुछ कह रहा है, क्या वह सच है कि आप दोनों और यह कौआ सिंह के यहाँ पर नौकरी करते हैं?” कहकर ऊँट ने एक नज़र कौए की ओर देखा। वह धीरे-धीरे मुस्कुरा रहा था। मगर ऊँट उसकी मुस्कुराहट ना देख पाया।

बाघ और सियार ने एक साथ कहा -“हाँ भाई, यह कौआ सब कुछ सच कह रहा है?”

उन दोनों की बात सुनकर ऊँट को कौए पर भरोसा हो गया। वह बोला-“ठीक है भाई, मैं चलने को तैयार हु, मगर एक शर्त है।”

“क्या शर्त है भाई?” कौए ने पूछा।

“तम मझे वचन दो कि सिंह से अभयदान दिलाओगे।”

कोआ कुछ सोचने के बाद बोला-“ठीक है, मैं वचन देता हूं कि तुम्हें अभयदान दिलाऊँगा और तुम्हारी सुरक्षा भी करूगा।”

कौए से वचन लेकर ऊँट उसके साथ चल दिया। जल्दी ही वे सभी सिंह के पास पहुँच गये।

कौए ने ऊँट को सिंह से अभयदान दिला दिया और उसके यहाँ नौकरी भी, मगर उसके मन में तो पाप घर कर चुका था, वह ऊंट के माँस के लिए तरस रहा था। वह निरंतर नए तरीके ढूँढ़ता रहता कि किस प्रकार ऊँट के माँस का स्वाद चखे? मगर सिंह तो ऊंट को अभयदान दे चुका था, बाघ और सियार बिना सिंह की मर्जी के ऊँट के हाथ भी नहीं लगा सकते थे और कौआ ऊंट का कुछ बिगाड़ नहीं सकता था।

इसी प्रकार दिन गुजरने लगे। ऊँट अपने दुश्मनों के बीच निर्भीकता से रहने लगा और कौआ उसे ललचाई निगाहों से देखते-देखते समय व्यतीत करने लगा।

मगर ईश्वर को तो कुछ और ही मन्जूर था। एक बार नन्दनवन में सूखा पड़ गया। जीव-जन्तु दाने-दाने को तरसने लगे और नन्दनवनको छोड़-छोड़ कर जाने लगे। जल्द ही पूरा बन खाली हो गया। जानवरों के वन छोड़ने का सबसे अधिक बुरा प्रभाव कौए, उसके साथी और उसके मालिक सिंह पर पड़ा।

जानवरों के ना होने से उनके भूखो मरने के दिन आ गये | जिन जानवरों को वे मारकर खाते थे, वही जानवर नन्दन वन को छोड़कर चले गये थे।

उस दिन वह चौथा दिन था, जब वे सभी भूख से छटपटा रहे थे। कौआ, सियार और बाघ एक स्थान पर बैठे बातें कर रहे थे और ऊंट उनसे अलग भूख निपटने का तरीका सोचने में मग्न था।

कौए ने सियार और बाघ से कहा “भूख से तड़पते आज चौथा दिन है, सभी जानबर वन छोड़कर चले गये हैं, खाने का दूर-दूर तक कोई इन्तजाम नजर नहीं आ रहा है।”

“हाँ भाई कौए, अब तो कुछ सोचने लायक भी ताकत नहीं है, बदन में।” सियार ने कौए की हाँ में हाँ मिलाई। और यही तो कौआ चाहता था। वह झट से बोला-“भाई, मुझे एक तरकीब तो नजर आ रही है, कहो तो बताऊँ?”

‘कहो भाई, जल्दी कहो!” बाघ ने तेजी से कहा।

“अगर इस ऊँट का काम हो जाए तो महीने भर का राशन मिल सकता है।” कहकर वह उन दोनों के हावभाव भाँपने लगा।

“छि: छि: कैसी बात रहे हो भाई, वह भाई है हमारा,- हमारे साथ रहता है, खाता है, पीता है, फिर मालिक ने उसे अभयदान दे रखा है ।” बाघ ने कौए की बात का विरोध किया।

“हाँ भाई, तुम्हारी बात ठीक है, लेकिन तुम यह बताओ कि यदि वह स्वयं ही खुद को हमें खाने को दे तो-” कौए ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी।

“तो… ” बाघ के मुंह से निकला। 

“तो कोई हर्ज नहीं है।” सियार ने वाक्य पूरा किया।

“हाँ तब तो कोई हर्ज नही है ।” बाघ ने भी सहमति दिखाई।

“तब समझो कि खाने का इन्तजाम हो गया। मगर.. ।” कौए ने फिर बात अधूरी छोड़ दी।

“मगर क्या?” सियार ने पूछा।

“मगर इसके लिए हमें मालिक को समझाना होगा ।” कौए ने अपना वाक्य पूरा किया।

“हाँ, यह तो सबसे आवश्यक है।” सियार ने कहा।

‘सुनो! मैं मालिक को जाकर समझाने की चेष्टा करता हूं।” कहकर कौआ उड़ गया।

कुछ ही देर बाद वह सिंह से कह रहा था–“मालिक! खाने का दूर-दूर तक कोई इन्तजाम नहीं है, अब आप ही बताएं क्या किया जाए?” कौए ने पहला तीर छोड़ा।

“हमारी तो कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करें और क्या न करें” सिंह ने कहा।

“मालिक, एक युक्ति है, यदि आज्ञा हो तो कहूँ।” कौए ने दूसरा तीर छोड़ा।

“ठीक है, कहो ।” 

“मालिक यदि इस ऊँट को मार दिया जाए तो कई.. ।”

“क्या कह रहे हो तुम?” सिंह ने कौए का वाक्य काट दिया- “तुम जानते हो कि हम उसे अभयदान दे चुके हैं।”

“पर मालिक यदि वह स्वयं ही अपने आप को खाने के लिए आपको दे तो… ।” कौए ने फिर अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

“तो..।” सिंह सोच में पड़ गया।

“तो भी आप उसे छोड़ देंगे?” कौए ने प्रश्न रखा।

“नहीं।” सिंह ने कहा “मगर ऐसा कैसे हो सकता है, कोई अपने आपको मारने के लिए क्यों कहेगा भला?”

“कहेगा मालिक।” 

“मगर कैसे ?” सिंह के पूछने पर कौए ने उसे अपनी युक्ति समझाई और वापस उड़ गया। वह सीधा अपने साथियों के पास आया और उन्हें युक्ति समझा दी।

कौए की युक्ति पर अमल करते हुए सिंह गुफा से बाहर आया और सभी से बोला-मेरे सेवकों! आज भी कुछ मिला या नहीं?”

“नहीं मालिक ” सियार योजनाबद्ध तरीके से बोला।

“मालिक चार दिन में आप कितना सूख गये हैं। आपकी यह दशा देखकर मन रोता है, आपका सेवक होते हुए भी आपको भूखा तड़पते देख रहा हु,मालिक एक ना एक दिन मुझे मरना है ही, यह शरीर नाशवान है, एक दिन गलसड़ जाएंगा, लीजिए आप इसे खाकर अपनी भूख मिटा लीजिए, इस तरह से मेरा शरीर तो काम आ जाएगा।” कौए ने कही।

“छिः-छि: भला ऐसा भी कहीं होता है कि मालिक ही अपने सेवक को खा जाए | मैं मर तो सकता हूँ, मगर ऐसा नहीं कर सकता” सिंह ने कौए की समझाई युक्ति पर अमल करते हुए कहा।

“मालिक आप कौए को नहीं खाएंगे तो मुझे ही खा लीजिए ।” बाघ भी आगे आया |

सिंह ने फिर वही वाक्य दोहरा दिया।

अब सियार ने भी वही वाक्य कहा जो बाघ ने कहा था।

सिंह ने फिर वही वाक्य दोहरा दिया।

यह सब देख और सुनकर ऊँट ने सोचा-‘कि उसे भी ऐसा ही कहना चाहिए | वैसे भी सिंह ने किसी को खाया तो नहीं और यदि वह पीछे रहता है तो सब उसे कायर और डरपोक कहेंगे ।” यह सोचकर उसने कहा-“मालिक! आप मुझे ही खा लीजिए, में इन सबसे बड़ा भी हूँ, आपका कुछ दिन का आहार ‘इकट्ठा हो जाएगा ।” ऊँट ने यह कह तो दिया, मगर वह बेचारा सीधा-सादा, भोला जानवर यह नहीं जानता था कि उससे यही कहलवाने के लिए तो उन चारों ने यह युक्ति भिड़ाई थी।

ऊँट के मुँह से ऐसा सुनते ही सिंह बहुत खुश हुआ, वह फौरन ऊँट पर झपट पड़ा और जल्दी ही उसे फाड़ डाला।

फिर चारों ने मिलकर उस भोले-भाले जानवर का माँस मजे से उड़ाया।

वे चारों मन ही मन खुश हो रहे थे।

सिंह, बाघ और सियार बार-बार कौए की चालाकी की प्रशंसा कर रहे थे। और कौआ अपनी सफलता पर मन ही मन मुस्कुरा रहा था। आज वह बहुत खुश था | आज ईश्वर ने महीनों पुरानी उसकी लालसा पूरी कर दी थी, कि वह ऊँट के मीठे-मीठे मांस का आनन्द ले सके।

इस प्रकार एक भोला-भाला जानवर उन कुटिलों के चंगुल में फंसकर मृत्यु को प्राप्त हुआ था। यह सब बुरी संगति का परिणाम था। दुष्टों और धूर्तों का साथ करने और उनकी बात मानने से ही सीधा-सादा ऊँट मारा गया।

इसीलिए कहते हैं कि बुरे जनों की संगत मौत का कारण होती है।

मित्रो“ प्रत्येक प्राणी को अपना हित-अहित अपनी बुद्धि विवेक से सोचना चाहिए। कभी-कभी बुरी संगति अपनी मीठी बातों में फसाकर मन में कुछ और तथा जुबान पर कुछ और रखकर अपने वारजाल में फंसाकर प्राणी को मौत के मुँह में पहुँचा देती है-जैसा कि भोले-भाले ऊंट के साथ हुआ।”

बात तो एकदम सही हैं बेचारा शाकाहारी ऊंट एक कौवे की चलाकी के कारण मारा गया| कौवे सर्वाहरी होते हैं| उस कव्वे जैसी सोच वाले कई मनुष्य भी होते हैं जो दिखावा तो ये करते हैं की क्रूर व्यक्ति से वे डरते हैं पर सीधे साधे भोले भाले लोग जब ऐसे लोगों के झांसे में आते हैं तो वे क्रूरता के शिकार हो जाते हैं| हो सके तो कव्वे जैसे व्यक्तियों पर भरोसा न करे|

   🌹🙏🏻🚩 *जय सियाराम* 🚩🙏🏻🌹

      🚩🙏🏻 *जय श्री महाकाल* 🙏🏻🚩

    🌹🙏🏻 *जय श्री पेड़ा हनुमान* 🙏🏻🌹

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साभार: तिवारीजी 

क्रियाशील

माहि अपने छोटे से कमरे  में गहरी नींद में सोया हुआ था। कमरे के शांत वातावरण में केवल घडी की टिक-टिक की आवाज गूंज रही थी।

टेबल पर रखी घड़ी की बड़ी सुई जैसे ही छोटी सुई से आकर मिली, उसने पूछा-“अरी कैसी हो छोटी सुई?”

“ठीक हूँ बहन, तुम कैसी हो?” अंगड़ाई लेकर छोटी सुई बोली।

“मैं तो चलते-चलते तंग आ गयी हैं। एक पल के लिये भी मुझे आराम नहीं मिलता। एक ही दायरे में घूमते-घूमते में तो अब ऊब गई हु। माहि का कुत्ता कालू तक सो रहा है, मगर हमें आराम नहीं ।”

“तुम ठीक कहती हो बहन। माहि को देखो, वह भी कैसे घोड़े बेचकर सो रहा है। खुद को सुबह उठाने का काम तक हमें सौंप रखा है। सुबह पाँच बजे जब हम अलार्म बजायेंगी, तब कहीं जाकर उठेगा क्या फायदा ऐसी जिन्दगी से ?”

“हाँ बहन.क्यों न हम भी चलना बन्द कर दें?” बड़ी सुई ने अपना सुझाव दिया। 

छोटी सुई को भी बड़ी सुई का यह सुझाव पसन्द आ गया और दोनों चुपचाप जहां की तहाँ ठहर गयीं।

सुबह जब माहि की आंख खुलीं तो कमरे में धूप देखकर वह चौंक उठा। टेबल पर रखी घड़ी की ओर देखा तो उसमें अभी तक दो ही बज रहे थे।

माहि घबराकर बोला-“ओह आज तो इस घड़ी ने मुझे धोखा दे दिया। कितनी देर हो गयी उठने में? अब कैसे पढ़ाई पूरी होगी?” घड़ी को कोसता हुआ माहि कुछ ही देर में कमरे से चला गया ।

उसे इस तरह बड़बड़ाता और गुस्से क कारण कमरे से बाहर जाता देख छोटी सुई हँसकर बोली-“आज पता चलेगा बच्चू को हमारा महत्व क्या है?” 

माहि के पिता ने जब घड़ी को बन्द देखा तो वे उसे उठाकर घड़ीसाज़ के पास ले गये।

घड़ीसाज़ ने उसे खोलकर अन्दर बारीकी से निरीक्षण किया। लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आया ।

और कुछ देर तक घड़ी को सही करने के प्रयास के बाद वह माहि के पिता से बोला-“श्रीमान जी, इस घड़ी में खराबी तो कोई नज़र नहीं आ रही। शायद यह बहुत पुरानी हो गयी है। अब आप इसे आराम करने दीजिये।”

माहि के पिता उसे वापस ले आये और उन्होंने उसे कबाड़े के बक्से में डाल दिया।

फिर उन्होंने बक्से को बन्द कर दिया और बाहर आ गये। बक्से में अन्य टूटी-फूटी वस्तुएं पड़ी थीं।

बक्सा बन्द होते ही छोटी सुई घबरा गयी। वह बोली-“बहन! यह हम कहाँ आ गये हैं? यहाँ तो बहुत अंधेरा है ।”

"अरी मेरा तो दम ही घुट रहा है।”. बड़ी सुई कराहती हुई बोली- “ये किस कैद खाने में बन्द हो गये हम? कोई हमें खुली हवा में ले जाये ।” 

किन्तु उनकी बात को सुनने वाला कोई नहीं था। 

अब दोनों को वह समय याद आ रहा था जब वे माहि के खुले हवादार कमरे में टेबल पर बिछे मेजपोश के ऊपर शान से इतराया करती थीं।

पास ही गुलदस्ते में ताजे फूल सजे होते थे। चलते रहने के कारण उनके शरीर में चुस्ती फुर्ती बनी रहा करती थी। कितनी कद्र थी उनकी आते जाते सब उनकी ओर देखते थे।

माहि बड़े प्यार से अपने रूमाल से घड़ी साफ किया करता था। अब दोनों सुइयाँ टिक-टिक करके चलने लगी थीं। क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि कुछ ना करने से बेहतर है, कुछ करते रहना।

निकम्मों और आलसियों को दुनिया में कोई काम नहीं। 

अब दोनों अपने किये पर पछता रही थीं और इस आशा में चल रही थीं कि शायद कोई इधर आये हमारी टिक-टिक की आवाज सुने और हमें इस कैद से निकालकर फिर मेज पर सजा दे। 

मित्रों“ चलना ही जिन्दगी है।” यानी जब तक आप क्रियाशील हैं तभी तक आपकी उपयोगिता बनी हुई है। तभी आपका जीवन सफल माना जायेगा और स्वयं भी आपको उस जीवन का आनन्द आयेगा। जिस प्रकार घड़ी की सुइयाँ बन्द हो गयीं तो उनके मालिक ने उन्हें व्यर्थ समझकर बॉक्स में बन्द कर दिया और फिर वे अपनी करनी पर कितनी पछताईं। अतः किसी को भी अपने जीवन को स्थिर नहीं रखना चाहिए।

और जो अपने धर्म, देश, संस्कृति के प्रति क्रियाशील हैं उसे ईश्वर हमेशा सफलता देते हैं| और अगर आपकी भी अपने धर्म के प्रति सुइया रुक गयी हैं तो आप भी समाज की दृष्टि में व्यर्थ हो जाओगे इसलिए अपने सभी कार्य धर्म को समर्पित करे|

   🌹🙏🏻🚩 *जय सियाराम* 🚩🙏🏻🌹

      🚩🙏🏻 *जय श्री महाकाल* 🙏🏻🚩

    🌹🙏🏻 *जय श्री पेड़ा हनुमान* 🙏🏻🌹

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साभार: तिवारीजी 


भोजन सामग्री

राधेश्याम नाम का किसान था। वह अपने खेत में हल चला रहा था। उसका बेटा केवल्य भी वहीं था। उसको खेत में एक हीरा मिला। वह चम-चम चमक रहा था। चमक उसे बहुत अच्छी लगी। वह उसे लेकर खेलने लगा

कुछ देर बाद केवल्य हीरा लेकर घर पहुंचा। मां को दिखाया। फिर साथियों को दिखाने घर से निकल पड़ा। साथियों ने चमकीले पत्थर को देखा तो वे माँगने लगे। उसने उन्हें दिया नहीं। 

केवल्य  के मित्र आनंद को वह हीरा बहुत अच्छा लग रहा था। वह रोते-रोते घर गया। उसने अपने पिताजी से कहा-मुझे हीरा चाहिए।”

उसके पिताजी ने पूछा- “हीरा क्या चीज है?” 

आनंद ने अपने पिता से कहा-“मैंने केवल्य के पास देखा है। वह बहुत चमकता है। उसकी चमक बहुत अच्छी लगती है। आप वह किसी तरह उस केवल्य से ले लीजिये ।”

आनंद के पिता केवल्य के पिता के पास पहुंचे और पचास रुपये देकर वह हीरा ले आया। केवल्य बहुत रोया, लेकिन पैसे के लोभ में उसके पिता हीरा बेचने के लिए मजबूर हो गया था।

कुछ दिनों के बाद आनंद पड़ोसी लड़के को वह हीरा पसन्द आ गया। वह हीरे के लिए रोने लगा। उसके माँ-बाप धनवान थे। पाँच सौ रुपये देकर उन्होंने हीरा खरीद लिया।

इस तरह उस हीरे का मूल्य बढ़ता गया। बढ़ते-बढ़ते उस हीरे का मूल्य एक लाख सुवर्ण मुद्राए हो गया।

लेकिन क्या जिस आदमी ने उस हीरे को एक लाख सुवर्ण मुद्राओं में खरीद लिया उसका एक समय भी उससे पेट भर सकता है? फिर दुनिया वाले ऐसे पत्थरों के पीछे क्यों पागल बनें?

पेट तो भरता है अनाज से, दूध से, घी से और मक्खन से फिर इन खाने की चीजों से बढ़कर दूसरा कोई हीरा नहीं हो सकता।

मित्रों“ संसार में सबसे अच्छी वस्तु भोजन सामग्री है। क्योंकि उससे पेट भरा जा सकता है जबकि हीरा मात्र एक पत्थर, उसे देखकर प्रसन्न तो हुआ जा सकता है लेकिन पेट नहीं भरा जा सकता। अतः हमें यदि पहली आवश्यकता भोजन की है तो हीरे में पैसे न गंवाकर पहले अनाज और भोजन सामग्री उगाने के लिये पेड़-पौधे और फसल उगानी चाहिये।”

   🌹🙏🏻🚩 *जय सियाराम* 🚩🙏🏻🌹

      🚩🙏🏻 *जय श्री महाकाल* 🙏🏻🚩

    🌹🙏🏻 *जय श्री पेड़ा हनुमान* 🙏🏻🌹

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साभार: तिवारीजी 

महंगाई के इस दौर में आपको घर में सब्जियाँ उगाने के लिए कोई नहीं कहेगा पर हा हाय कितना महंगा हो गया हैं ये रोना रोकर आपको भ्रमित किया जायेगा| अगर आपको लगता हैं की सब्जियाँ मेहंगी हैं तो घर में लगाना शुरू कर दीजिये दोनों काम होंगे प्राणवायु भी मिलेगा और ताज़ी सब्जी भी मिलेगी|

साहसी बुढ़िया

बात ज्यादा पुरानी भी नहीं हैं। एक राज्य में कम पढ़े-लिखे यानि कि अज्ञानी लोग रहते थे। वहाँ का राजा भी अज्ञानियों में गिना जाता था।

राज्य की खुशहाली उस समय भंग हो गयी थी जब सभी एक अनजाने डर के बीच जिन्दा रहने की कोशिश कर रहे थे। कारण यह था कि राज्य में रात के समय किसी घण्टे की टनटन की आवाज आती थी, इसी कारण पुरे राज्य में भय व्याप्त था। हर आदमी के चेहरे पर आतंक देखा जा सकता था।

सभी समझ रहे थे कि यह सब कोई भूत कर रहा है। और भूत के डर के कारण सभी के कामधन्धे मन्दे पड़े थे।

इस प्रेत के आतंक से वहाँ का राजा भी अपरिचित और चिंतित था। मगर किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें ?

एक दिन राज्य के महामन्त्री ने राजा को सुझाव दिया कि वह राज्य के आसपास के इलाकों में यह मुनादी करवा दें कि जो कोई भी घण्टे वाले प्रेत को सदासदा के लिए खत्म कर देगा उसे मुँहमाँगा ईनाम दिया जायेगा।

राजा ने महामन्त्री की सलाह पर तत्काल अमल किया और राज्य के आसपास वाले इलाकों में मुनादी करवा दी कि घण्टे वाले प्रेत को खत्म करने बाले को मुँहमाँगा ईनाम दिया जाएगा।

उस राज्य के पड़ौसी राज्य की सीमा पर एक गाँव में एक बुढ़िया रहती थी, वह अत्यधिक गरीब किन्तु साहसी थी। उसके साहस की चर्चा आसपास के इलाकों में फैली हुई थी। राजा की मुनादी सुनकर उसने उस भूत को मारने का बीड़ा उठाया ।

राजा की आज्ञा पाकर वह उस राज्य के कुछ लोगों से मिली और उनसे पूछा-“रात को घण्टे की आवाज किस दिशा से आती है?’

लोगों ने बताया–“जंगल की ओर से!”

इस बात का पता करके बुढ़िया रात को जंगल में पहुँच गई। उसने देखा कि कुछ बन्दर एक घण्टे को पेड़ पर टांग कर हिला रहे हैं और खुशी के मारे उछल-कूद कर रहे हैं।

यह दृश्य देखकर बुढ़िया समझ गई कि मामला क्या है? उसने अनुमान लगाया कि “हो-न-हो इन बन्दरों के हाथ कहीं से यह घण्टा लग गया और ये इसे बजाबजा कर खुश हो रहे हैं, और रात में ही इसे बजाते हैं।”

बुढ़िया ने वहीं खड़े-खड़े उन बन्दरों से निपटने की तरकीब सोची और वापस आ गई।

मगर उसने अपनी मौजूदगी का एहसास किसी को नहीं कराया और सुबह अंधेरे-अंधेरे ही अपने साथ कुछ चने लेकर वह वापस जंगल की ओर रवाना हो गई।

इधर सुबह को पूरे राज्य में यह बात फैल गई कि बुढ़िया को घण्टे वाला प्रेत खा गया। क्योंकि रात भी घण्टा बजता रहा था।

यह अफवाह समाचार के रूप में राजा तक भी जा पहुँची। राजा ने यह सुना तो वो चिंतित हो उठा कि अब घण्टे वाले प्रेत का आतंक किस प्रकार समाप्त किया जाएगा?

इधर यह सब कुछ हो रहा था और उधर बुढ़िया चने लेकर जंगल में उसी स्थान पर जा पहुँची, जहाँ बन्दर घण्टा बजाते थे। उसने चनों को जमीन पर डाल दिया। चने देखते ही सारे बन्दर चनों पर टूट पड़े और बुढ़िया ने मौका

देखकर वह घण्टा पेड़ से उतार लिया। बन्दर चने खाने में ही मगन रहे।

बुढ़िया घण्टा लेकर पास के एक तालाब पर पहुँची और घण्टे को तालाब में डाल दिया। और फिर राज्य में जा पहुँची। राज्यवासी उसे देखकर आश्चर्यचकित रह गये। बुढ़िया राजा के पास पहुँची और उससे बोली-“महाराज!अब वह प्रेत कभी आपको परेशान नहीं करेगा। मैंने सदा-सदा के लिए उसे मार डाला।”

“मगर तुमने उसे मारा कैसे?” राजा ने आश्चर्य से पूछा।

“महाराज, मैं तन्त्रमन्त्र जानती हैं, मैंने उस प्रेत को जला डाला है।”

तब राजा ने उसे मुँहमाँगा ईनाम दिया।

बुढ़िया वापस लौटते हुए सोच रही थी-“कितने मूर्ख लोग हैं, यदि ये अक्ल से काम लेते तो इन्हें इतना सारा धन मुझ पर व्यय नहीं करना पड़ता।”

तभी एक आकाशवाणी हुई-“बुढ़िया तू अक्लमन्द है, होशियार है, और वे सब अज्ञानी लोग हैं।"

"तभी तो घण्टे वाले प्रेत से डर गये।” बुढ़िया ने मन ही मन मुस्कुरा कर सोचा।

मित्रों“ ज्ञान मनुष्य के अन्दर साहस, बल और आत्मविश्वास जगाता है,  किन्तु अज्ञान मनुष्य को निर्बल, असहाय और कायर बना देता है। इसलिए आवश्यकता है ज्ञान की, ज्ञान अर्जन करके हम अपने अन्दर शक्ति का संचार उत्पन्न कर सकते हैं।”


   🌹🙏🏻🚩 *जय सियाराम* 🚩🙏🏻🌹

      🚩🙏🏻 *जय पेडा हनुमान        🚩🙏🏻

साभार: तिवारीजी 

अब ऐसे ही कुछ घंटे के प्रेत आज भी समाज को डराए रखने के लिए पिछले कुछ दशकों से बज रहे हैं और जो लोग अपने आप को आधुनिक बताने के चक्कर में अपने इस्तिहस का ज्ञान नहीं रखते हैं, अपनी परमपरा का ज्ञान नहीं रखते उनकी फैलाई मुर्खता भरी बातों की वजह से हम बजते हुए घंटे को ढूंढ भी नहीं रही हैं| अभीभी समय नहीं गया हैं मुर्खता भरी भयपूर्ण बाते प्रचारित करनेवालों पर भरोसा करने की जगह अपने गौरवपूर्ण इतिहास का ज्ञान लेने में ही असली चतुराई हैं|

चतुर-चिड़िया


एक दिन की बात है एक चिड़िया आकाश में अपनी उड़ान भर रही होती है। रास्ते में उसे गरुड़ मिल जाता है। गरुड़ उस चिड़िया को खाने को दौड़ता है। चिड़िया उससे अपनी जान की भीख मांगती है। लेकिन गरुड़ उसपर दया करने को तैयार नहीं होता। 

तब चिड़िया उसे बताती है कि मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं और उनके लालन पालन के लिए मेरा जीवित रहना जरूरी है।

गरुड़ इस पर चिड़िया के सामने एक शर्त रखता है कि मेरे साथ दौड़ लगाओ और अगर तुमने मुझे पराजित कर दिया तो मैं तुम्हे अभय दान दूंगा और तुम्हें यहां से जाने दूंगा। 

गरुड़ इस बात को जानता था कि चिड़िया का उसे दौड़ में हराना असंभव है। इसलिए उसके सामने इतनी कठिन शर्त रख देता है।

चिड़िया के पास इस दौड़ के लिए हां करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता। लेकिन चिड़िया को इस बात का अंदाजा था कि गरुड़ को दौड़ में हराना नामुमकिन है लेकिन फिर बी वह इस दौड़ के लिए हां कर देती है। 

पर वह गरुड़ से कहती है कि जब तक ये दौड़ समाप्त नहीं होती वह उसे नहीं मारेगा। 

गरुड़ इस बात पर तैयार हो जाता है। दौड़ शुरू होती है चिड़िया फट से जाकर गरुड़ के सिर पर बैठ जाती है और जैसे ही गरुड़ दौड़ के आखिरी स्थान पर पहुंचता है चिड़िया फट से उड़ कर लाइन के पार पहुंच जाती ही और जीत जाती है। 

गरुड़ उसकी चतुरता से प्रसन्न हो जाता है और उसको जिंदा छोड़ देता है। चिड़िया तुरंत ही वहां से उड़ जाती है और अपने रास्ते चल देती है।

मित्रों" कठिन परिस्थितियों में रोना नहीं चाहिए बल्कि समझदारी और चतुरता के साथ मुसीबत का सामना करना चाहिए। विरोधी या कार्य आपकी क्षमता से ज्यादा मजबूत हो तो इसका मतलब यह नहीं कि आप पहले से ही हार मान कर बैठ जाएं बल्कि समझदारी और धैर्य से बैठ कर समस्या का समाधान ढूढ़ना चाहिए। अपने ऊपर विश्वास रखना चाहिए कि हम किसी भी परिस्थिति में जीत सकते है।

   🌹🙏🏻🚩 *जय सियाराम* 🚩🙏🏻🌹

      🚩🙏🏻 *जय श्री महाकाल* 🙏🏻🚩

    🌹🙏🏻 *जय श्री पेड़ा हनुमान* 🙏🏻🌹

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साभार: तिवारीजी 

आज के परिवेश में जब आपको पता हैं की आपका शत्रु गरुड़ के समान शक्तिशाली हैं जिसकी शक्ति का स्त्रोत कही न कही विदेश में हैं तो आपने भी चिड़िया की जैसी चतुराई सीखनी हैं|

 


Tuesday, 6 June 2023

फिल्म भक्त विदुर १९२१

जय श्री राम
भारतीय सिनेमा शुरू से ही कहानियों को बदलकर दिखाता आया है।
1921 में कोहिनूर फिल्म कंपनी ने भक्त विदुर ये फिल्म बनाई। यह फिल्म महाभारत के विदुरजी के जीवन पर आधारित थी।
विदुरजी महान विष्णु भक्त थेl एक अच्छे योद्धा भी थे। तलवारबाजी में वह निपुण थे। कौरव राजसभा का मंत्री पद उन्होंने अच्छे से सुशोभित किया था राजनीति और रणनीति दोनों ही विदुरजी को पता थी। विदुरजी कही से भी अहिंसावादी नही थे।
इस फिल्म में विदुरजी की छवि गांधीजी जैसी बताई गई। उस समय भारत में ब्रिटिश गवर्नमेंट ने इस फिल्म को बैन कर दिया था क्योंकि विदुरजी को मोहनदास गांधी की तरह बताया गया था।
इस फिल्म को कांजी भाई राठौड़ ने निर्देशित किया था और विदुर की मुख्य भूमिका द्वारकादास संपत ने निभाई थी।
अंग्रेजों के जमाने से मतलब पिछले 100 सालों से भी ज्यादा समय से भारतीय सिनेमा महाभारत जैसी पवित्र कथा को भी बदल कर बताती आ रही है तो सोचिए आज तक भारतीय सिनेमा ने कितनी कहानियां बदल कर अपने दर्शकों को भ्रमित किया होगा?

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