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Monday, 7 August 2023

क्रियाशील

माहि अपने छोटे से कमरे  में गहरी नींद में सोया हुआ था। कमरे के शांत वातावरण में केवल घडी की टिक-टिक की आवाज गूंज रही थी।

टेबल पर रखी घड़ी की बड़ी सुई जैसे ही छोटी सुई से आकर मिली, उसने पूछा-“अरी कैसी हो छोटी सुई?”

“ठीक हूँ बहन, तुम कैसी हो?” अंगड़ाई लेकर छोटी सुई बोली।

“मैं तो चलते-चलते तंग आ गयी हैं। एक पल के लिये भी मुझे आराम नहीं मिलता। एक ही दायरे में घूमते-घूमते में तो अब ऊब गई हु। माहि का कुत्ता कालू तक सो रहा है, मगर हमें आराम नहीं ।”

“तुम ठीक कहती हो बहन। माहि को देखो, वह भी कैसे घोड़े बेचकर सो रहा है। खुद को सुबह उठाने का काम तक हमें सौंप रखा है। सुबह पाँच बजे जब हम अलार्म बजायेंगी, तब कहीं जाकर उठेगा क्या फायदा ऐसी जिन्दगी से ?”

“हाँ बहन.क्यों न हम भी चलना बन्द कर दें?” बड़ी सुई ने अपना सुझाव दिया। 

छोटी सुई को भी बड़ी सुई का यह सुझाव पसन्द आ गया और दोनों चुपचाप जहां की तहाँ ठहर गयीं।

सुबह जब माहि की आंख खुलीं तो कमरे में धूप देखकर वह चौंक उठा। टेबल पर रखी घड़ी की ओर देखा तो उसमें अभी तक दो ही बज रहे थे।

माहि घबराकर बोला-“ओह आज तो इस घड़ी ने मुझे धोखा दे दिया। कितनी देर हो गयी उठने में? अब कैसे पढ़ाई पूरी होगी?” घड़ी को कोसता हुआ माहि कुछ ही देर में कमरे से चला गया ।

उसे इस तरह बड़बड़ाता और गुस्से क कारण कमरे से बाहर जाता देख छोटी सुई हँसकर बोली-“आज पता चलेगा बच्चू को हमारा महत्व क्या है?” 

माहि के पिता ने जब घड़ी को बन्द देखा तो वे उसे उठाकर घड़ीसाज़ के पास ले गये।

घड़ीसाज़ ने उसे खोलकर अन्दर बारीकी से निरीक्षण किया। लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आया ।

और कुछ देर तक घड़ी को सही करने के प्रयास के बाद वह माहि के पिता से बोला-“श्रीमान जी, इस घड़ी में खराबी तो कोई नज़र नहीं आ रही। शायद यह बहुत पुरानी हो गयी है। अब आप इसे आराम करने दीजिये।”

माहि के पिता उसे वापस ले आये और उन्होंने उसे कबाड़े के बक्से में डाल दिया।

फिर उन्होंने बक्से को बन्द कर दिया और बाहर आ गये। बक्से में अन्य टूटी-फूटी वस्तुएं पड़ी थीं।

बक्सा बन्द होते ही छोटी सुई घबरा गयी। वह बोली-“बहन! यह हम कहाँ आ गये हैं? यहाँ तो बहुत अंधेरा है ।”

"अरी मेरा तो दम ही घुट रहा है।”. बड़ी सुई कराहती हुई बोली- “ये किस कैद खाने में बन्द हो गये हम? कोई हमें खुली हवा में ले जाये ।” 

किन्तु उनकी बात को सुनने वाला कोई नहीं था। 

अब दोनों को वह समय याद आ रहा था जब वे माहि के खुले हवादार कमरे में टेबल पर बिछे मेजपोश के ऊपर शान से इतराया करती थीं।

पास ही गुलदस्ते में ताजे फूल सजे होते थे। चलते रहने के कारण उनके शरीर में चुस्ती फुर्ती बनी रहा करती थी। कितनी कद्र थी उनकी आते जाते सब उनकी ओर देखते थे।

माहि बड़े प्यार से अपने रूमाल से घड़ी साफ किया करता था। अब दोनों सुइयाँ टिक-टिक करके चलने लगी थीं। क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि कुछ ना करने से बेहतर है, कुछ करते रहना।

निकम्मों और आलसियों को दुनिया में कोई काम नहीं। 

अब दोनों अपने किये पर पछता रही थीं और इस आशा में चल रही थीं कि शायद कोई इधर आये हमारी टिक-टिक की आवाज सुने और हमें इस कैद से निकालकर फिर मेज पर सजा दे। 

मित्रों“ चलना ही जिन्दगी है।” यानी जब तक आप क्रियाशील हैं तभी तक आपकी उपयोगिता बनी हुई है। तभी आपका जीवन सफल माना जायेगा और स्वयं भी आपको उस जीवन का आनन्द आयेगा। जिस प्रकार घड़ी की सुइयाँ बन्द हो गयीं तो उनके मालिक ने उन्हें व्यर्थ समझकर बॉक्स में बन्द कर दिया और फिर वे अपनी करनी पर कितनी पछताईं। अतः किसी को भी अपने जीवन को स्थिर नहीं रखना चाहिए।

और जो अपने धर्म, देश, संस्कृति के प्रति क्रियाशील हैं उसे ईश्वर हमेशा सफलता देते हैं| और अगर आपकी भी अपने धर्म के प्रति सुइया रुक गयी हैं तो आप भी समाज की दृष्टि में व्यर्थ हो जाओगे इसलिए अपने सभी कार्य धर्म को समर्पित करे|

   🌹🙏🏻🚩 *जय सियाराम* 🚩🙏🏻🌹

      🚩🙏🏻 *जय श्री महाकाल* 🙏🏻🚩

    🌹🙏🏻 *जय श्री पेड़ा हनुमान* 🙏🏻🌹

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साभार: तिवारीजी 


भोजन सामग्री

राधेश्याम नाम का किसान था। वह अपने खेत में हल चला रहा था। उसका बेटा केवल्य भी वहीं था। उसको खेत में एक हीरा मिला। वह चम-चम चमक रहा था। चमक उसे बहुत अच्छी लगी। वह उसे लेकर खेलने लगा

कुछ देर बाद केवल्य हीरा लेकर घर पहुंचा। मां को दिखाया। फिर साथियों को दिखाने घर से निकल पड़ा। साथियों ने चमकीले पत्थर को देखा तो वे माँगने लगे। उसने उन्हें दिया नहीं। 

केवल्य  के मित्र आनंद को वह हीरा बहुत अच्छा लग रहा था। वह रोते-रोते घर गया। उसने अपने पिताजी से कहा-मुझे हीरा चाहिए।”

उसके पिताजी ने पूछा- “हीरा क्या चीज है?” 

आनंद ने अपने पिता से कहा-“मैंने केवल्य के पास देखा है। वह बहुत चमकता है। उसकी चमक बहुत अच्छी लगती है। आप वह किसी तरह उस केवल्य से ले लीजिये ।”

आनंद के पिता केवल्य के पिता के पास पहुंचे और पचास रुपये देकर वह हीरा ले आया। केवल्य बहुत रोया, लेकिन पैसे के लोभ में उसके पिता हीरा बेचने के लिए मजबूर हो गया था।

कुछ दिनों के बाद आनंद पड़ोसी लड़के को वह हीरा पसन्द आ गया। वह हीरे के लिए रोने लगा। उसके माँ-बाप धनवान थे। पाँच सौ रुपये देकर उन्होंने हीरा खरीद लिया।

इस तरह उस हीरे का मूल्य बढ़ता गया। बढ़ते-बढ़ते उस हीरे का मूल्य एक लाख सुवर्ण मुद्राए हो गया।

लेकिन क्या जिस आदमी ने उस हीरे को एक लाख सुवर्ण मुद्राओं में खरीद लिया उसका एक समय भी उससे पेट भर सकता है? फिर दुनिया वाले ऐसे पत्थरों के पीछे क्यों पागल बनें?

पेट तो भरता है अनाज से, दूध से, घी से और मक्खन से फिर इन खाने की चीजों से बढ़कर दूसरा कोई हीरा नहीं हो सकता।

मित्रों“ संसार में सबसे अच्छी वस्तु भोजन सामग्री है। क्योंकि उससे पेट भरा जा सकता है जबकि हीरा मात्र एक पत्थर, उसे देखकर प्रसन्न तो हुआ जा सकता है लेकिन पेट नहीं भरा जा सकता। अतः हमें यदि पहली आवश्यकता भोजन की है तो हीरे में पैसे न गंवाकर पहले अनाज और भोजन सामग्री उगाने के लिये पेड़-पौधे और फसल उगानी चाहिये।”

   🌹🙏🏻🚩 *जय सियाराम* 🚩🙏🏻🌹

      🚩🙏🏻 *जय श्री महाकाल* 🙏🏻🚩

    🌹🙏🏻 *जय श्री पेड़ा हनुमान* 🙏🏻🌹

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साभार: तिवारीजी 

महंगाई के इस दौर में आपको घर में सब्जियाँ उगाने के लिए कोई नहीं कहेगा पर हा हाय कितना महंगा हो गया हैं ये रोना रोकर आपको भ्रमित किया जायेगा| अगर आपको लगता हैं की सब्जियाँ मेहंगी हैं तो घर में लगाना शुरू कर दीजिये दोनों काम होंगे प्राणवायु भी मिलेगा और ताज़ी सब्जी भी मिलेगी|

साहसी बुढ़िया

बात ज्यादा पुरानी भी नहीं हैं। एक राज्य में कम पढ़े-लिखे यानि कि अज्ञानी लोग रहते थे। वहाँ का राजा भी अज्ञानियों में गिना जाता था।

राज्य की खुशहाली उस समय भंग हो गयी थी जब सभी एक अनजाने डर के बीच जिन्दा रहने की कोशिश कर रहे थे। कारण यह था कि राज्य में रात के समय किसी घण्टे की टनटन की आवाज आती थी, इसी कारण पुरे राज्य में भय व्याप्त था। हर आदमी के चेहरे पर आतंक देखा जा सकता था।

सभी समझ रहे थे कि यह सब कोई भूत कर रहा है। और भूत के डर के कारण सभी के कामधन्धे मन्दे पड़े थे।

इस प्रेत के आतंक से वहाँ का राजा भी अपरिचित और चिंतित था। मगर किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें ?

एक दिन राज्य के महामन्त्री ने राजा को सुझाव दिया कि वह राज्य के आसपास के इलाकों में यह मुनादी करवा दें कि जो कोई भी घण्टे वाले प्रेत को सदासदा के लिए खत्म कर देगा उसे मुँहमाँगा ईनाम दिया जायेगा।

राजा ने महामन्त्री की सलाह पर तत्काल अमल किया और राज्य के आसपास वाले इलाकों में मुनादी करवा दी कि घण्टे वाले प्रेत को खत्म करने बाले को मुँहमाँगा ईनाम दिया जाएगा।

उस राज्य के पड़ौसी राज्य की सीमा पर एक गाँव में एक बुढ़िया रहती थी, वह अत्यधिक गरीब किन्तु साहसी थी। उसके साहस की चर्चा आसपास के इलाकों में फैली हुई थी। राजा की मुनादी सुनकर उसने उस भूत को मारने का बीड़ा उठाया ।

राजा की आज्ञा पाकर वह उस राज्य के कुछ लोगों से मिली और उनसे पूछा-“रात को घण्टे की आवाज किस दिशा से आती है?’

लोगों ने बताया–“जंगल की ओर से!”

इस बात का पता करके बुढ़िया रात को जंगल में पहुँच गई। उसने देखा कि कुछ बन्दर एक घण्टे को पेड़ पर टांग कर हिला रहे हैं और खुशी के मारे उछल-कूद कर रहे हैं।

यह दृश्य देखकर बुढ़िया समझ गई कि मामला क्या है? उसने अनुमान लगाया कि “हो-न-हो इन बन्दरों के हाथ कहीं से यह घण्टा लग गया और ये इसे बजाबजा कर खुश हो रहे हैं, और रात में ही इसे बजाते हैं।”

बुढ़िया ने वहीं खड़े-खड़े उन बन्दरों से निपटने की तरकीब सोची और वापस आ गई।

मगर उसने अपनी मौजूदगी का एहसास किसी को नहीं कराया और सुबह अंधेरे-अंधेरे ही अपने साथ कुछ चने लेकर वह वापस जंगल की ओर रवाना हो गई।

इधर सुबह को पूरे राज्य में यह बात फैल गई कि बुढ़िया को घण्टे वाला प्रेत खा गया। क्योंकि रात भी घण्टा बजता रहा था।

यह अफवाह समाचार के रूप में राजा तक भी जा पहुँची। राजा ने यह सुना तो वो चिंतित हो उठा कि अब घण्टे वाले प्रेत का आतंक किस प्रकार समाप्त किया जाएगा?

इधर यह सब कुछ हो रहा था और उधर बुढ़िया चने लेकर जंगल में उसी स्थान पर जा पहुँची, जहाँ बन्दर घण्टा बजाते थे। उसने चनों को जमीन पर डाल दिया। चने देखते ही सारे बन्दर चनों पर टूट पड़े और बुढ़िया ने मौका

देखकर वह घण्टा पेड़ से उतार लिया। बन्दर चने खाने में ही मगन रहे।

बुढ़िया घण्टा लेकर पास के एक तालाब पर पहुँची और घण्टे को तालाब में डाल दिया। और फिर राज्य में जा पहुँची। राज्यवासी उसे देखकर आश्चर्यचकित रह गये। बुढ़िया राजा के पास पहुँची और उससे बोली-“महाराज!अब वह प्रेत कभी आपको परेशान नहीं करेगा। मैंने सदा-सदा के लिए उसे मार डाला।”

“मगर तुमने उसे मारा कैसे?” राजा ने आश्चर्य से पूछा।

“महाराज, मैं तन्त्रमन्त्र जानती हैं, मैंने उस प्रेत को जला डाला है।”

तब राजा ने उसे मुँहमाँगा ईनाम दिया।

बुढ़िया वापस लौटते हुए सोच रही थी-“कितने मूर्ख लोग हैं, यदि ये अक्ल से काम लेते तो इन्हें इतना सारा धन मुझ पर व्यय नहीं करना पड़ता।”

तभी एक आकाशवाणी हुई-“बुढ़िया तू अक्लमन्द है, होशियार है, और वे सब अज्ञानी लोग हैं।"

"तभी तो घण्टे वाले प्रेत से डर गये।” बुढ़िया ने मन ही मन मुस्कुरा कर सोचा।

मित्रों“ ज्ञान मनुष्य के अन्दर साहस, बल और आत्मविश्वास जगाता है,  किन्तु अज्ञान मनुष्य को निर्बल, असहाय और कायर बना देता है। इसलिए आवश्यकता है ज्ञान की, ज्ञान अर्जन करके हम अपने अन्दर शक्ति का संचार उत्पन्न कर सकते हैं।”


   🌹🙏🏻🚩 *जय सियाराम* 🚩🙏🏻🌹

      🚩🙏🏻 *जय पेडा हनुमान        🚩🙏🏻

साभार: तिवारीजी 

अब ऐसे ही कुछ घंटे के प्रेत आज भी समाज को डराए रखने के लिए पिछले कुछ दशकों से बज रहे हैं और जो लोग अपने आप को आधुनिक बताने के चक्कर में अपने इस्तिहस का ज्ञान नहीं रखते हैं, अपनी परमपरा का ज्ञान नहीं रखते उनकी फैलाई मुर्खता भरी बातों की वजह से हम बजते हुए घंटे को ढूंढ भी नहीं रही हैं| अभीभी समय नहीं गया हैं मुर्खता भरी भयपूर्ण बाते प्रचारित करनेवालों पर भरोसा करने की जगह अपने गौरवपूर्ण इतिहास का ज्ञान लेने में ही असली चतुराई हैं|

चतुर-चिड़िया


एक दिन की बात है एक चिड़िया आकाश में अपनी उड़ान भर रही होती है। रास्ते में उसे गरुड़ मिल जाता है। गरुड़ उस चिड़िया को खाने को दौड़ता है। चिड़िया उससे अपनी जान की भीख मांगती है। लेकिन गरुड़ उसपर दया करने को तैयार नहीं होता। 

तब चिड़िया उसे बताती है कि मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं और उनके लालन पालन के लिए मेरा जीवित रहना जरूरी है।

गरुड़ इस पर चिड़िया के सामने एक शर्त रखता है कि मेरे साथ दौड़ लगाओ और अगर तुमने मुझे पराजित कर दिया तो मैं तुम्हे अभय दान दूंगा और तुम्हें यहां से जाने दूंगा। 

गरुड़ इस बात को जानता था कि चिड़िया का उसे दौड़ में हराना असंभव है। इसलिए उसके सामने इतनी कठिन शर्त रख देता है।

चिड़िया के पास इस दौड़ के लिए हां करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता। लेकिन चिड़िया को इस बात का अंदाजा था कि गरुड़ को दौड़ में हराना नामुमकिन है लेकिन फिर बी वह इस दौड़ के लिए हां कर देती है। 

पर वह गरुड़ से कहती है कि जब तक ये दौड़ समाप्त नहीं होती वह उसे नहीं मारेगा। 

गरुड़ इस बात पर तैयार हो जाता है। दौड़ शुरू होती है चिड़िया फट से जाकर गरुड़ के सिर पर बैठ जाती है और जैसे ही गरुड़ दौड़ के आखिरी स्थान पर पहुंचता है चिड़िया फट से उड़ कर लाइन के पार पहुंच जाती ही और जीत जाती है। 

गरुड़ उसकी चतुरता से प्रसन्न हो जाता है और उसको जिंदा छोड़ देता है। चिड़िया तुरंत ही वहां से उड़ जाती है और अपने रास्ते चल देती है।

मित्रों" कठिन परिस्थितियों में रोना नहीं चाहिए बल्कि समझदारी और चतुरता के साथ मुसीबत का सामना करना चाहिए। विरोधी या कार्य आपकी क्षमता से ज्यादा मजबूत हो तो इसका मतलब यह नहीं कि आप पहले से ही हार मान कर बैठ जाएं बल्कि समझदारी और धैर्य से बैठ कर समस्या का समाधान ढूढ़ना चाहिए। अपने ऊपर विश्वास रखना चाहिए कि हम किसी भी परिस्थिति में जीत सकते है।

   🌹🙏🏻🚩 *जय सियाराम* 🚩🙏🏻🌹

      🚩🙏🏻 *जय श्री महाकाल* 🙏🏻🚩

    🌹🙏🏻 *जय श्री पेड़ा हनुमान* 🙏🏻🌹

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साभार: तिवारीजी 

आज के परिवेश में जब आपको पता हैं की आपका शत्रु गरुड़ के समान शक्तिशाली हैं जिसकी शक्ति का स्त्रोत कही न कही विदेश में हैं तो आपने भी चिड़िया की जैसी चतुराई सीखनी हैं|

 


Tuesday, 6 June 2023

फिल्म भक्त विदुर १९२१

जय श्री राम
भारतीय सिनेमा शुरू से ही कहानियों को बदलकर दिखाता आया है।
1921 में कोहिनूर फिल्म कंपनी ने भक्त विदुर ये फिल्म बनाई। यह फिल्म महाभारत के विदुरजी के जीवन पर आधारित थी।
विदुरजी महान विष्णु भक्त थेl एक अच्छे योद्धा भी थे। तलवारबाजी में वह निपुण थे। कौरव राजसभा का मंत्री पद उन्होंने अच्छे से सुशोभित किया था राजनीति और रणनीति दोनों ही विदुरजी को पता थी। विदुरजी कही से भी अहिंसावादी नही थे।
इस फिल्म में विदुरजी की छवि गांधीजी जैसी बताई गई। उस समय भारत में ब्रिटिश गवर्नमेंट ने इस फिल्म को बैन कर दिया था क्योंकि विदुरजी को मोहनदास गांधी की तरह बताया गया था।
इस फिल्म को कांजी भाई राठौड़ ने निर्देशित किया था और विदुर की मुख्य भूमिका द्वारकादास संपत ने निभाई थी।
अंग्रेजों के जमाने से मतलब पिछले 100 सालों से भी ज्यादा समय से भारतीय सिनेमा महाभारत जैसी पवित्र कथा को भी बदल कर बताती आ रही है तो सोचिए आज तक भारतीय सिनेमा ने कितनी कहानियां बदल कर अपने दर्शकों को भ्रमित किया होगा?

Wednesday, 31 May 2023

निर्जला एकादशी व्रत कथा

निर्जला एकादशी व्रत जेष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाता है निर्जला एकादशी वर्त साल भर की 24 एकादशी का जो फल होता है उस के बराबर फल निर्जला एकादशी व्रत करने से प्राप्त होता है इसलिए निरजला एकादशी को सूर्य उदय से लेकर द्वादशी सूर्योदय तक कुछ भी अन्न जल  नहीं लेना चाहिए और द्वादशी को प्रात काल स्नान पूजन करने के पश्चात भगवान को भोग  लगाना चाहिए ब्राह्मणों को तथा शक्ति दान देना चाहिए उसके पश्चात अपने आप प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलना चाहिए जो लोग निर्जला एकादशी के दिन ब्राह्मणों को अन्य जल दक्षिणा वस्त्रों सहित अन्न का दान करते हैं उनको अक्षय फल की प्राप्ति होती है

पांडु पुत्र भीम सेन ने व्यास जी से पूछा हे पितामह …माता कुन्ती  भ्राता युधिस्टर ,अर्जुन, नकुल, सहदेव, और द्रौपदी आदि सभी एकादशी का व्रत करते हैं और मुझे भी अनाज खाने को मना करते हैं परंतु मैं उनसे कहता हूं कि भक्तिपूर्वक भगवान की पूजा कर सकता हूं दान कर सकता हूं भक्ति कर सकता हूं परंतु भोजन के बिना नहीं रह सकता हूं

व्यास जी ने कहा …हे पांडु पुत्र  भीम सेन यदि तुम नरक और स्वर्ग को अच्छा समझते हो तो प्रत्येक मास की दोनों पक्ष की एकादशी को अन्न मत खाया करो

भीम ने कहा .... मै पहले ही कह चुका हूं कि मैं भोजन के बिना नहीं रह सकता यदि साल भर में कोई एक ही बात हो तो मैं रख सकता हूं मेरे पेट में ब्रिक नाम वाली अग्नि है मैं भोजन के बिना  नहीं रह सकता हूँ  आप कोई ऐसा  व्रत बताइए जो वर्ष भर में केवल एक बार ही करना पड़े और मुझे  स्वर्ग की प्राप्ति हो जाए

व्यास जी के आज्ञा अनुसार भीमसेन ने निर्जला एकादशी का व्रत किया तथा इस एकादशी को भीमसेन या पांडव एकादशी भी कहा जाता है निर्जला व्रत करने वाले प्रातः काल भगवान विष्णु का पूजन करके प्राथना करें हे भगवान आज मै श्रद्धा पूर्वक निर्जला व्रत रखकर दूसरे दिन भोजन करूंगा  आपकी कृपा से मेरे सब पाप नष्ट हो जाए इस दिन जल से भरा हुआ बर्तन वस्त्र स्वर्णा दक्षिण ब्राह्मणों को दान करनी चाहिए जो मनुष्य इस ब्रत को करते हैं उनको करोड़ों करोड़ों तीर्थों की यात्रा का संगम गंगा के किनारे स्नान करने से सूर्य ग्रहण चंद्र ग्रहण में कुरुक्षेत्र में सोने चांदी हाथी घोडा  दान करने से जो फल मिलता है वह फल  निर्जला एकादशी के व्रत से प्राप्त हो जाता है जिन्होंने निर्जला एकादशी का व्रत किया वे लोग ब्रत के प्रभाव से स्वर्ग जाते हैं

हे भीमसेन ..जो पुरुष या स्त्री श्रद्धा पूर्वक इस ब्रत को करते हैं उनके निम्नलिखित कर्म करने चाहिए  प्रथम भगवान का पूजन फिर गोदान ब्राह्मणों को मिष्ठान दक्षिणा देनी चाहिए तथा जल से भरे कलश का दान अवश्य करना चाहिए निर्जला  के दिन अन्न वस्त्र उपाहन अनाज का दान  करना चाहिए  । जो मनुष्य भक्तिपूर्वक  कथा को पढ़ते हैं या ब्राह्मणों के मुख्य से सुनता हैं उनको निश्चय ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है  बोलो एकादशी महत्यम्य् की जय

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Monday, 8 May 2023

क्या भारतीय सिनेमा या बॉलीवुड की हर फिल्म आपको केवल सच बताती आई हैं?

 

द केरला स्टोरी यह फिल्म हाल ही में रिलीज हुई हैं और चर्चा का विषय बन चुकी हैं| कुछ फिल्म क्रिटिक्स जो असल में पेड रिव्यु देते हैं उनके हिसाब से ये एक प्रोपगंडा फिल्म हैं| इस फिल्म की कहानी को झूठा साबित करने की पूरी कोशिश की जा रही हैं और कोर्ट केस भी हो गयी हैं|

पर क्या भारतीय सिनेमा या बॉलीवुड की हर फिल्म आपको केवल सच बताती आई हैं?

नहीं भारत की कोई भी कमर्शियल मसाला फिल्म आपको कोई सत्य बताती नहीं हैं| ये १९४० के दशक से केवल भारत की संस्कृति और बहुसंख्यांक हिन्दू समाज को बदनाम और भ्रमित करने के लिए बनायीं गयी हैं| और आप ये ब्रेनवाशिंग आपकी ही कमाई के पैसों से देखते हो आपका अपना कीमती समय देकर|

आपको शायद ये बात गलत लगे पर भारतीय सिनेमा का इतिहास रहा हैं की तत्थ्यों को मोड़कर आपके सामने प्रस्तुत किया जाए और आपके विचारों को देश और धर्म के विरुद्ध भड़काया जाए या हिन्दू होने के नाते आपको शर्मिंदा किया जाए|

श्री ४२० में राज कपूर अपनी प्रेमिका को दिवाली के दिन छोड़कर जुआ खेलने लगता हैं| इस सुपरहिट फिल्म ने दिवाली का स्वरुप विकृत कर दिया| पहले तो यह ट्रेंड सेट हो गया की दिवाली जुआ खेलने का (जो की लक्ष्मीजी का अपमान हैं) का मौका हैं और लोग मॉडर्न बनने के नाम पर लक्ष्मी पूजन के जगह जुए को ज्यादा महत्त्व देने लगे| ऐसा कोई धर्म धरती पर नहीं हैं जो ये कहे की त्यौहार के दिन जुआ खेलो और गरीब हो जाओ पर बॉलीवुड आपको ये झूठ दशकों से परोसता आया हैं और आप आपका समय बर्बाद कर इस झूठ को स्वीकार किये जा रहे हो|

बॉलीवुड का बड़ा फेमस विलेन हैं तेजा जो दिवाली के दिन विजय (अमिताभ बच्चन) के माँ बाप को दिवाली के पटाखों के आवाज का सहारा लेकर मार देता हैं| कुछ ऐसे ही होली के दिन गब्बर (फिर से अमिताभ बच्चन की शोले फिल्म) खून की होली खेलने के लिए गाव में आता हैं| कुछ ऐसे ही होली के दिन किसी दामिनी के घर बलात्कार की घटना होती हैं जो बड़ी भयानकता के साथ दिखाई गयी| ऐसा कोई त्यौहार बॉलीवुड ने नहीं छोड़ा जिसका स्वरुप बदले की भावना से ना जोड़ा गया हो| अमिताभ बच्चन इसमें एक्सपर्ट हैं| ये कलाकार नवरात्रि में माता के ही मंदिर में खून खराबा करता हैं| एंग्री यंग अमिताभ की कई फिल्मे हैं जिसमे हिन्दू त्यौहार पर खून खराबा किया गया हैं और ये अब ट्रेंड बन गया हैं जो फिल्मों तक सिमित नहीं बल्कि टीवी सेर्तिअल्स और सोशल मीडिया के स्केच वीडियोज में भी हैं| ये ट्रेंड इसीलिए बन गया हैं क्यों की हमने इस तरह के दृश्यों पर कोई आपत्ति नहीं जताई|

महाशिवरात्रि पर एक गाना बड़ी जोरशोर से हिन्दू लगते हैं और वो हैं राजेश खन्ना का जय जय शिवशंकर| इस गाने में हिन्दू साधू वेश में राजेश खन्ना के समेत कई कलाकार शिव आराधना के नाम पर भांग का नशा कर अश्लील हरकते करते हैं| और इन अश्लील नशेडी हरकतों के पर हमने ही कोई आपत्ति नहीं जताई और ये गाना रातोरात लोकप्रिय हो गया और आज भी नयी पीढ़ी इसे बड़े चाव से सुनती और देखती हैं| पर ये अश्लीलता होली के गीतों में भी हैं|

होली का पर्व प्रकृति के रंगों से प्रकृति को धन्यवाद देने का पर्व हैं और राधा कृष्ण की आराधना इसका अभिन्न अंग हैं| बागवान फिल्म का “होली खेले रघुवीर अवध में” यही गीत ले लीजिये| बड़े जोर शोर से इस गीत पर होली पार्टी में हिन्दू ठुमके लगाते हैं| गाने का अर्थ निकालता हैं, ‘आप पुरुष हैं और आपको होली पर मौका मिलता हैं की आप हर महिला को अपने हिसाब से शरीर पर कही भी रंग लगादो इसमें शर्माने की कोई बात नहीं हैं|’ और ऐसे ही हर गीत को अश्लीलता से हर होली पर रिलीज़ किया गया और हिन्दू समाज ने ही ऐसे अश्लील गानों को लोकप्रिय बनाया|

बात केवल आपके त्योहारों की ही नहीं आपके मंदिरों की भी हैं| गर्मियों में लोग श्रीनगर, कश्मीर घुमने जाते हैं तो उन्हें सिलसिला फिल्म के “देखा एक ख्वाब” गाने में बताया गया तुलिप गार्डन देखना हैं पर शंकराचार्य मंदिर नहीं जाना हैं| शंकराचार्य मंदिर नहीं जाने का कारन भी बॉलीवुड की फिल्म मिशन कश्मीर में हैं जिसमे शंकराचार्य मंदिर को आतंकवादियों का अड्डा बताया गया|

ये सारा भ्रम भारतीय संस्कृति को निचा दिखाकर भोले भले मासूम समाज का ब्रेनवाशिंग करने के लिए ही बॉलीवुड कई दशकों से किये जा रहा हैं| इसका असर ये होता हैं की लोग तिलक जनेवु छोड़कर चादर और फादर के झांसे में आये| भोली लड़कियों का ब्रेनवाशिंग इन्ही फ़िल्मी सीन्स को बताकर पहले शुरू किया जाता हैं और बाद में उनके साथ जो होता हैं वो द केरला स्टोरी में बताया गया हैं|

आपका कीमती समय, आपकी मेहनत की कमी दोनों आपने इस ब्रेनवाशिंग पर मनोरंजन के नाम पर बर्बाद करना या दोनों का सदुपयोग कर अपने धर्मग्रंथों में लिखी गाथाये पढ़कर स्वयं का तथा अपने बालक बालिकाओं का चरित्र निर्माण करना यह आपका निर्णय हैं| इस लेख का काम आपको सिक्के की दूसरी साइड दिखाना हैं|

मेरे बचपन में मेरी माताजी ने मुझे ये कहा था, “फिल्मों में जो बताते हैं उनमे पाच प्रतिशत सत्य होता हैं|” मैंने सुना क्युकी माताजी की बात में प्रभाव था| आज के बालक इस बात को बोलकर नहीं सुनेंगे| वे इस बात को माने इसके लिए उन्हें पहले अपने व्यवहार में गलत को न देखने की बात लानी पड़ेगी तभी उनकी बात का प्रभाव होगा|

यहाँ तक पढ़ने के लिए धन्यवाद!

जय जय श्री राम!

© रिंकू ताई!

 

ए आय संग बाते: #काला_कानून_वापस_लो

#काला_कानून_वापस_लो ये क्यों ट्रेंड हो रहा है? @ grok यह हैशटैग हाल के सुप्रीम कोर्ट फैसले के विरोध में...