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Wednesday, 20 December 2023

शैतान का साया

आज की कहानी थोड़ी अलग हैं|

आप ही तय करना जो हुआ क्या वो सही था?

कहानी शुरू करने से पहले आपको यह बात बता दू की यह कहानी बिलकुल काल्पनिक हैं| अगर इस कहानी से किसी की भी कोई भी भावना आहत होती हैं तो वे इस बात को भी समझ ले की मुझे भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हैं| काल्पनिक कहानी को ज्यादा मन पर न ले|

आज पखाम्बा की कोर्ट में बेल की अर्जी की सुनवाई हैं| उसे लेकर पुलिस वाले कोर्ट पोहोच ही रहे थे| उसे मिलने, उसे सात्वना देने उसके गाव से सिवाय उसकी पत्नी चानू के कोई नहीं आया| चानू बार बार मन ही मन अपनी कुलदेवी को प्रार्थना कर रही थी की आज पखाम्बा की रिहाई हो जाए| 

पखाम्बा मणिपुर के हलंग गाव का था| उसपर गाव के ही केविन की हत्या का आरोप था| केविन मतिमंद था| बड़ी निर्दयता से किसी ने उसकी हत्या कर दी थी| पुलिस ने कुछ गवाहों के कहने पर पखाम्बा को धर लिया था| इसी कारण गाव से कोई भी पखाम्बा के साथ नहीं था|

गवाहों में उसके सबसे अच्छा दोस्त जोसेफ सबसे आगे था जिसने कहा था, "जिस दिन केविन की हत्या हुई उस दिन केविन जंगल की और भागे जा रहा था| पखाम्बा केविन के पीछे जंगल की और गया था|" यही बात अन्य गवाहों ने भी कही| किसी भी गवाह ने पखाम्बा को केविन को पिटते हुए या मारते हुए नहीं देखा था|

सुनवाई शुरू हुई| पखाम्बा के दलील दी, "साहब मैं निर्दोष हूँ| मुझे फसाया जा रहा हैं| मैं तो अपने काम से जंगल की और जा रहा था| मुझे तो ये भी नहीं पता था की केविन मेरे पहले जंगल की और गया हैं| मैं जंगल से लकड़ियाँ काट कर बेचने का काम करता हूँ| इसीलिए उस दिन भी मैं जंगल में लकड़ियाँ कटाने ही गया था| मैंने केविन को जंगल में देखा भी नहीं| शाम को जब मैं घर आया तो मुझे पता चला की केविन को किसीने बहुत पिटा और उसकी हालत ख़राब हैं| इसीलिए मैं उसे देखने उसके घर गया था| बेचारे केविन, उसकी माँ मरियम के जाने के बाद अकेला हो गया था| उसके भाई पीटर और रोमिल उसे अस्पताल भी नहीं ले गए और वो तड़प तड़प कर मर गया|"

चानू को गवाही के लिए कटघरे में बुलाया गया| चानू ने अपनी कुलदेवी का स्मरण करते हुए जज साहब को झुक कर प्रणाम किया और कहा, "साहब मेरे पति निर्दोष हैं| ये उसदिन जंगल में रोज की तरह लकड़ी काटने ही गए| दोपहर के समय मुझे जोसेफ की घरवाली मेरी ने बताया की केविन को किसी ने जंगल में बहुत पीटा| जख्मी हालत में उसे घर लेकर आये हैं| हालत ख़राब हैं|" 

चानू ने आगे कहा, "साहब ये मेरी और जोसेफ ने इसके पहले भी केविन के बारे में गलत सलत बाते फैलाई हैं| दोनों कहते हैं की केविन पर शैतान का साया हैं इसीलिए वो मतिमंद हैं|"

इस बात की पुष्टि अन्य गवाहों से भी की गयी| अधिकतर गवाह चर्च में जाकर नित्य प्रार्थना करने वाले थे| वो ये भी मानते थे की शैतान होता हैं| इसीलिए उन्होंने केविन की मतिमंद हालत के लिए शैतान को जिम्मेदार बताया|

फिर जोसेफ की बारी आई, उसने बताया, "साहब जब तक केविन की माँ मरियम जिन्दा थी गाव में किसी की केविन को कुछ बोलने की हिम्मत नहीं होती थी| चर्च के फादर ने कई बार मरियम को समझाया की वो केविन कलकत्ता के बड़े चर्च में भेज दे| वहा पर उसे हर रोज पवित्र पानी में नहलाया जायेगा और शैतान का साया उतार दिया जायेगा| मरियम कहती थी, अगर गॉड ने उसे ऐसा बनाया हैं तो कोई वजह होगी, कोई शैतान का साया नहीं हैं|"

फिर गाव के अन्य लोगों की भी गवाही हुई| जोसेफ के बहन रूबी भी इस मामले में गवाह थी| रूबी ने कहा, "केविन पर शैतान का साया था| इसीलिए मेरी और पीटर की मेरेज के लिए जोसेफ तैयार नहीं था| जोसेफ को चर्च जाने वाला हसबंड मेरे लिए चाहिए था| पीटर रोज चर्च जाता था| पर केविन से दिक्कत थी जोसेफ को| केविन को मरियम रोज चर्च ले जाती थी| वहा फादर पवित्र पानी उसपर हर रोज छिड़कते थे, पर केविन में कभी कोई बदलाव आया ही नहीं| इसीलिए जोसेफ नहीं चाहता था की मैं पिटर के साथ मेरेज करूँ| केविन के पीछे पखाम्बा को जाते हुए मैंने नहीं देखा पर जोसेफ ने देखा इसीलिए मैंने भी उसकी हाँ में हाँ मिला दी| केविन के मरने से मेरी और पीटर की मेरेज अब आराम से हो सकेगी|"

रूबी की ये बात सुनकर पखाम्बा के वकील ने कोर्ट से प्रार्थना की, "यह मामला पेचीदा हो गया हैं जज साहब| क्यों की केविन के मरने से पखाम्बा को कोई लाभ नहीं होना था पर पीटर और रूबी जो एक दुसरे से प्रेम करते हैं उनके मेरेज का रास्ता साफ़ हो गया हैं| इस मामले के मुख्य गवाह जो केविन के प्रति ये धारणा रखते थे की केविन पर शैतान का साया हैं, जो की एकदम ही गलत हैं| हो सकता हैं की गाव के अन्य गवाह भी रूबी की तरह जोसेफ के हाँ में हाँ मिला रहे हो| इसीलिए मेरे पक्षकार पखाम्बा को बेल दी जाए और इस मामले की गहन तहकीकात की जाए|" कोर्ट ने वकील की इस दलील को ध्यान में रखते हुए मामले की फिर से तहकीकात के आदेश दिए|

अब पुलिस ने फिर से गाव के कई लोगों के बयान लिए| हलंग गाव की जनसंख्या ५००० से ऊपर नहीं थी| पुलिस ने पीटर के संपर्क में आने वाले सभी लोगों से पूछताछ की| तब एक बात सामने आई| वो थी जोसेफ और पखाम्बा के बिच बचपन से दोस्ती थी और अचानक एक दिन जोसेफ ने उसके साथ बात करना बंद कर दिया| जोसेफ चर्च का पादरी भी बनना चाहता था| पर फादर को जोसेफ और पखाम्बा को दोस्ती पसंद नहीं थी, क्यों की पखाम्बा गॉड की जगह अपनी कुलदेवी को मानता था| 

फिर से पखाम्बा के घर पुलिस पूछताछ के लिए गयी| पखाम्बा ने कहा, "साहब ये जोसेफ मेरा बचपन का दोस्त हैं| ये हर रोज चर्च जाता हैं| मुझे इसके चर्च जाने से कोई दिक्कत नहीं हैं| पर इसे मेरी कुलदेवी से दिक्कत हैं| मेरे गाव में एक भी मंदिर नहीं हैं| मैं अपने घर में अपनी कुलदेवी की नित्य आराधना करता हूँ| ये पिछले पाच साल से मेरे साथ सिर्फ इसीलिए बात नहीं कर रहा हैं क्यों की मैं क्रिसमस ट्री को सजाने बजाय तुलसी माता का विवाह योगेश्वर श्रीकृष्ण से कराने में ज्यादा विश्वास रखता हूँ|"

फिर जोसेफ से पूछा गया, और उसने हांमी भरी| जोसेफ ने कहा, "जो संताक्लौस दे सकता हैं वो इसके श्रीकृष्ण नहीं दे सकते|"

फिर एक बात और सामने आई| रोमिल केविन को कभी पसंद नहीं करता था| हमेशा उसे मारते रहता था| जबतक मरियम जिन्दा थी, तबतक रोमिल घर से दूर ही रहता था| हफ्ते में एखाद दिन के लिए घर पर आता था| 

आगे और पूछताछ करने पर पता चला मरियम के पास अपना प्राइवेट जंगल था ५० एकड़ का| काफी अच्छी कमाई हो जाती थी उससे| टिम्बर हो या पोपी बहुत पैसा मिलता था मरियम को| इस प्रॉपर्टी का हक़दार वही होने वाला था जो केविन को संभालेगा| अगर केविन को कलकत्ता के बड़े चर्च में छोड़ा गया तो पूरी प्रॉपर्टी चर्च के नाम होने वाली थी| इसीलिए पीटर और रोमिल ने उसे मरियम के मरने के बाद कलकत्ता के बड़े चर्च में नहीं भेजा| पर दोनों भाई केविन से परेशान थे| रोमिल तो उसे कभी पसंद नहीं करता था| पीटर देखभाल करता था पर रूबी को भी चाहता था| मरियम जिन्दा थी तब ही जोसेफ ने रूबी और पिटर के मेरेज को नकार दिया था| ये बात पक्की हैं की मरियम की प्रॉपर्टी अब रोमिल और पीटर को ही मिलनी हैं| 

पुलिस ने फिर से मौका ए वारदात की अच्छेसे जांच की| तब उन्हें वहा पर एक क्रॉस वाला लॉकेट मिला| गाव में जो भी चर्च जाता उसके गले में क्रॉस वाला लॉकेट रहना जरुरी था| पुरे गाव में पखाम्बा और चानू ही थे जो कुलदेवी को पूजा करते थे| बाकी पूरा गाव चर्च में हर रोज जाता| पखाम्बा चर्च नहीं जाता था इसीलिए उसके बच्चों को गाव की स्कूल में दाखिला नहीं दिया गया| उसके बच्चे दिल्ली में अपनी भुआ के यहाँ पढ़ने के लिए रहने चले गए थे| पखाम्बा को भी काम देने से मनाई की जाती थी| यह भेदभाव होते रहने के बाद भी पखाम्बा अपने कुलदेवी की पूजा छोड़ने के लिए तैयार नहीं था| और पता नहीं कैसे उसे कही से न कही से लकड़ी काटने का काम मिल ही जाता था| 

जिस दिन केविन की हत्या हुई उसदिन पखाम्बा मरियम के प्राइवेट जंगल के आगे वाले जंगल में पेड़ की छटाई करने गया था| पुरे गाव में उसके जैसे छटाई का काम कोई नहीं करता था सिर्फ इसीलिए उसे ये काम मिलता था| छटाई के बाद जो लकडिया निकलती थी वो भी वो पूरी साफ़ करके अपने साथ ले जाता था| आधी प्राइवेट जंगल के मालिक को देता था और आधी खुद बेच देता था| इसी तरह उसका घर चल रहा था| केविन की पिटाई मरियम के प्राइवेट जंगल में हुई थी| इसीलिए ये बात तो पक्की हो गयी की पखाम्बा ने केविन को नहीं मारा|

हलंग से दस किलोमीटर पर मिशनरी दवाखाना हैं| आसपास के गाव के सभी इसाई इसी दवाखाने में जाते हैं| केविन को जब बुरी तरह से जख्मी हालत में घर लाया गया तब उसे किसी ने भी यहाँ तक के पीटर और रोमिल ने भी उस दवाखाने में नहीं दाखिल किया| अकेला पखाम्बा था उसदिन जो कह रहा था, केविन को दवाखाने में लेकर जाओ| केविन के भाइयों को केविन के मरने के बाद मरियम की पूरी प्रॉपर्टी मिलने वाली थी और दोनों ने उसे दवाखाने में भी नहीं बताया| इस के कारण पुलिस को पीटर और रोमिल पर शक होने लगा| लेकिन वो क्रॉस वाला लॉकेट दोनों का नहीं था| 

अब मामला पेचीदा हो गया| रूबी, मेरी और जोसेफ के गले में तो लॉकेट दिख रहे थे| तो जाने कैसे की लॉकेट किसका हैं| पर ये बात तो पक्की थी जिसने भी केविन को मारा उसे केविन पर बहुत गुस्सा था| केविन तो एक मासूम था| उसके मतिमंद होने में किसी की कोई गलती नहीं थी और न ही उसकी कोई गलती थी| पर शैतान का साया जैसी धारणा जिसका कोई प्रमाण नहीं हैं उस के करना केविन से नफरत हो सकती हैं|

क्रॉस वाला लॉकेट जो पुलिस को मिला उसका फोरेंसिक टेस्टिंग करने के लिए दया गया था| पूरी जांच के बाद पता चला की लॉकेट मेरी का हैं| मेरी जोसेफ की वाइफ| कई बार केविन के साथ मरियम के जंगल जाती थी| वहा केविन के साथ क्या करती थी किसी को पता नहीं| पर जाती जरुर थी| उस दिन केविन भागते हुए जंगल की और गया| उसके पीछे दबे पाँव मेरी भी चली गयी| जिस रस्ते केविन गया उसी रस्ते से पखाम्बा अपने काम से गया था| पखाम्बा के पीछे जोसेफ भी गया था| वो असल में पखाम्बा के पीछे गया था| गाव के कुछ लोगों के हिसाब से पिछले कुछ दिनों से जोसेफ पखाम्बा पर नजर रखे हुए था| क्यों ये किसी को नहीं पता| 

पर उस दिन रस्ते में जोसेफ ने मेरी को मरियम के जंगल की तरफ जाते देखा| जोसेफ ने पखाम्बा का पीछा छोड़ ये जानना चाहाकी मेरी जो घर से चर्च के लिए निकली थी वो मरियम के जंगल में क्या कर रही हैं| पखाम्बा ने पाच साल पहले मेरी की इस हरकत के बारे में जोसेफ को बताया था और इसी बात पर से जोसेफ ने पखाम्बा के साथ बात करना बंद कर दिया था| पखाम्बा ने अपनी दोस्ती के खातिर ये बात किसी को नहीं बताई यहाँ तक के पुलिस को भी नहीं| दबे शब्दों में गाव के लोगों ने मेरी के बारे में पुलिस को पहले ही बता दिया था|

फिर उस दिन जोसेफ मरियम के जंगल में मेरी के पीछे पीछे गया| जोसेफ सब कुछ छुप कर देख रहा था की कैसे मेरी जोसेफ को धोखा दे रही हैं और केविन के साथ अपनी तन की प्यास मिटा रही हैं| अचानक मेरी की नजर जोसेफ पर गिरी और मेरी ने चीखते चिल्लाते पास में रखे रोड से केविन को पीटना शुरू कर दिया| मेरी केविन को पिटती रही, फिर केविन की चीखे बंद हो गयी और मेरी ने भी पीटना बंद कर दिया| 

तब तक जोसेफ जा चूका था| पर जोसेफ मेरी को छोड़ भी नहीं सकता था, कम से कम तब तक तो नहीं जब तक रूबी का मेरेज नहीं हो जाता| क्यों की जोसेफ के पास अपनी कोई प्रॉपर्टी नहीं थी| मेरी के पास भी अपना एक प्राइवेट जंगल था जिससे जोसेफ की जिंदगी खुशहाली में चल रही थी| जोसेफ ने फिर शांति से सोचा और फिर पुरे मामले में पखाम्बा को दोषी करार देने का ठान लिया क्यों की मेरी की हरकत के बारे में बताने वाले पखाम्बा से उसे दिक्कत तो थी ही और पखाम्बा कभी भी जोसेफ के कहने पर अपनी कुलदेवी की पूजा छोड़कर चर्च में नहीं गया इस बात का भी गुस्सा था| बची रूबी की जिम्मेदारी तो अब केविन के मरने के बाद रूबी और पीटर की मेरेज से जोसेफ को कोई आपत्ति नहीं थी| इसीलिए जोसेफ ने मेरी को बचाने के लिए पखाम्बा को फ़साने की कोशिश की|

पर सच सबके सामने आना ही था| वो आ गया| कोर्ट ने मेरी पर हत्या तथा लैगिक उत्पीडन के तहत आरोप लगाते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई और यह भी निश्चित किया की शैतान का साया जैसी कोई चीज नहीं होती| ये कहानियाँ किसी मतिमंद के उत्पीडन के लिए उपयोग में लायी जाती हैं|

इसके बाद कोर्ट ये भी कहा की हर व्यक्ति को अपनी धर्मिक भावनाओं के अनुसार अपने धर्म के पालन का अधिकार हैं| पखाम्बा के दृढ़ निश्चय और अपनी कुलदेवी तथा श्रीकृष्ण पर अटूट विश्वास के कारण न्याय मिला और केवीन के हत्या के पीछे के पाखंड का भी खुलासा हुआ| पखाम्बा की भक्ति देख गाव के वो लोग भी श्रीकृष्ण की शरण में आने लगे जो जोसेफ के कहने पर अपने घर के देवताओं की पूजा करना छोड़ चुके थे| 

बस आज की कहानी में इतना ही|

Wednesday, 29 November 2023

महालक्ष्मी व्रत कथा

एक नगर होते. नगराचा एक राजा होता. त्याचे नाव होते भद्रश्रवा. तो द्याळू, शुर व प्रजादक्ष होता. देवा-ब्राम्हणांना, साधुसंतांना सुखवीत होता. आनंद देत होता. राजाच्या राणीचं नाव सुरतचंद्रिका होतं. नाव चांगलं, पण स्वभावात अहंकार. मागील जन्मी ती एका वैश्याची पत्नी होती. तिचं नवर्‍याशी भांडण होई. भांडणानं वैतागली. रागानं घराबाहेर पडली. चालत होती अनवाणी रानातून. तिथं तिला दिसल्या सुवासिनी. त्या करत होत्या, लक्ष्मीचं व्रत. ते तिनं पाहिलं. त्यांच्याबरोबर तिनही व्रत केलं. दुःख विसरली. दारिद्र्य गेलं. परिस्थिती सुधारली. देवीची भक्ती फळाला आली. कालांतराने ती मरण पावली. पुढे तिचा पुनर्जन्म झाला. स्त्रीचाच जन्म पुन्हा मिळाला; पण भाग्य उजळलं. भद्रश्रवा राजाशी तिचा विवाह झाला. ऎश्वर्यात लोळू लागली. गर्वानं ती फुगली. दास-दासींवर रागावली. एकदा काय झालं. देवीच्याही मनात आलं, राणीला आपण भेटावं. मागच्या जन्माची आठवण द्यावी. ओळखते की नाही हे बघावं. राणी राजव्ड्यात सुखाने रहात होती. राजाही कौतुक करी. तिचे लाड पुरवी. त्या दोघांना पुढे सात पुत्र आणि एक कन्या झाली. कन्येचं नाव होतं शामबाला.

एके दिवशी काय झालं, देवीनं म्हातारीचं रुप घेतलं. फाटकंवस्त्र नेसली. माथी मळवट फासला. हाती काठी घेतली. काठी टेकीत टेकीत राणीला भेटायला आली. तिनं आरोळी दिली – “अरे, आहे कां घरात कुणी ? कुणी घास देईल का?”

दासी बाहेर आली. म्हातारी दारात दिसली. तिनं विचारलं, “कोण गं तू? आलीस कुठनं? काय काम काढलं आहे? तुझं नाव काय? गाव कोणतं? तुला हवयं कायं?”

मधून मधून खोकत हळू आवाजात म्हातारी सांगू लागली, “माझं नाव कमला. द्वारकेहून आलेय गं! राणीला भेटायचंय! कुठं आहे गं राणी?"

दासी म्हणाली, “राणीसाहेब महालात आहेत! सख्यांशी गप्पा मारताहेत! त्यांना सागितलं तर माझ्यावर रागावतील. तुला गं त्या कश्या भेटणार! काय तुझा हा अवतार! तुला पाहून माझ्यावर ओरडतील. उणं-दुणं बोलतील. त्यांच्या सख्याही तुला हसतील. तू जरा आडोशाला बैस. मैत्रिणी गेल्या म्हणजे मी सांगते त्यांना!”

म्हातारी रागावली, मनोमन संतापली, “तुझी राणी पैशाला भाळली. माणुसकी विसरली. दरिद्री मेली! आज झालीय राणी. पण देवीला विसरली. माझ्यामुळेच ना! मीच तिला व्रत सांगितलं देवीचं! तिनं ते केलं. आता राणी पदावर बसली. देवीला आठवणही राहिली नाही. गर्व झालाय संपत्तीचा! पैशाची धुंदी आलीय! गोरगरिबांची पर्वा नाही. थोर्‍या मोठ्यांच्या मुली. त्या झाल्या मैत्रिणी! म्हातारी गरीब अन्‌ भिकारीण! तिला कोण वचारतयं! पण, याचं फळं तिला भोगावंच लागेल. तेव्हाच तिचे डोळे उघडतील. जाते मी.”

दासी घाबरली. तिनं म्हातारीला पाणी दिलं. हात जोडून म्हणाली, ”ते व्रत मला सांगाल! मी ते नेमानं करीन! उतणार नाही, मातणार नाही, घेतला वसा टाकणार नाही. दिलेला शब्द मोडणार नाही.”

त्या दासीला व्रताचा वसा सांगितला. म्हातारी उठली. काठी टेकीत निघाली, तोच माडीवरुन राणीची कन्या शामबाला धावत आली. ती कळवळून म्हणाली, ”आजी, रागावू नका. चुकली माझी आई! तिच्या वतीनं मी क्षमा मागते. कृपा करा. दिलेला शाप मागे घ्या. पाया पडते तुमच्या! म्हातारीला मुलीची दया आली. म्हातारीनं क्षणभर त्या मुलीकडे पाहिलं, आणि तिला लक्ष्मीव्रताचा वसा सांगितला.

मुलीचा निरोप घेऊन म्हातारी निघणार, तोच राणी माडीवरून आली. दाराशी येते, तर म्हातारी दिसली! राणी ओरडली, “ए थेरडे! कशाला गं आलीस? जा इथून! ऊठ म्हणतेय ना! जातेस की नाही? दुसरी घरं नाही दिसली तुला?” म्हातारीने संतापाने गरागरा डोळे फिरविले. कपाळावर आठ्या पसरल्या. ती तडक घराबाहेर पडली.

दासीनं लक्ष्मीव्रत केलं. तिची स्थिती सुधारली! दासीपण गेलं. संसार सुखाचा झाला.

पुढं मार्गशीर्ष महिना आला. पहिल्याच गुरूवारी शामबालेनं लक्ष्मीव्रतास सुरुवात केली. सगळे नेमधर्म पाळले. चार गुरुवारी तिनं लक्ष्मीव्रत केलं. शेवटच्या गुरुवारी यथासांग उद्यापन झालं.

सिध्देश्वर राजाचा पुत्र मालाधर. त्याच्याशी शामबालेचा विवाह झाला. राजवैभवातील शामबालेला राजवैभव मिळालं. हा होता, लक्ष्मीव्रताचा प्रभाव. सुखा-समाधानानं संसार चालू होता. भद्रश्रवा व सुरतचंद्रिका राणीचे मात्र भाग्य फिरले. शत्रूने राज्यावर चाल केली. भद्रश्रवाचं राज्य लुबाडलं. सुरतचंद्रिकेचं राणीपद गेलं. भद्रश्रवाला वाईट वाटलं. पूर्वीचे दिवस आठवले. रानावनात फिरुन राजा-राणी कष्टाने दिवस काढत होते.

‘भद्रश्रवाला कन्येला भेटावसं वाटलं. तो एकटाच निघाला. चालून चालून दमला. नदीकाठावर विश्रांतीसाठी थांबला. नदीकडे येताना राणीच्या दासीनं भद्रश्रवाला पाहिलं. घाईघाईनं ती राजवाड्यात गेली. राजाला सांगितलं. मालाधरानं माणसं पाठवली. आणायला रथ पाठवला. सासर्यांना घरी आणलं. सन्मानानं नवी वस्त्र व कंठीहार दिला. शामबाला वडिलांची काळजी घेत होती. काही दिवसांनी राजाला वाटलं, आता परत जावं. जावयाला तसं त्यानं सांगितलं. मुलीचा निरोप घेतला. जावयानं मोहरा भरलेला हंडा नोकराकडे देऊन राजासोबत पाठवलं. राजा घरी परतला. चंद्रिकेला भेटला. हंडा पाहून ती आनंदली. घाईनं तिनं झाकण काढलं. आत बघते तर काय, तिला कोळसेच दिसले.

सुरतचंद्रिकेनं कपाळावर हात मारला. नशिबाला दोष दिला. नवर्याला सांगितलं. ते ऐकून तोही चकित झाला. दु:ख पाठलाग करीत होते. दारिद्र्य सरत नव्हते. चिंतेचे सावट पसरत होते. काळजीचा वणवा भडकतच होता. सुरतचंद्रिकेचा एकेक दिवस दु:खाचा जात होता एके दिवशी तिला मुलीला भेटावे, डोळे भरुन पहावं वाटलं. नशिबाचे भोग भोगायचेच आहेत. सुरतचंद्रिका घरुन निघाली. मुलीच्या सासरी पोचली. तो दिवस गुरुवारचा होता. नदीतीरावर जरा वेळ बसली. दमली होती. त्याच वेळी एक दासी नदीवर आली. तिनं राणीच्या आईला ओळखलं. घाईनं ती महालात गेली. राणीला निरोप दिला. तुमची आई आलीय. नदीकिनारी बसलीय. खूप दमलेली दिसली. तिला आणायला कुणीतरी पाठवा.”

शामबालेनं सारथ्यासोबत रथ नदीकडे पाठवला. आईला घेऊन यायला सांगितलं. आई रथात बसून महालात आली. आईला बघताच शामबालानं आनंदाने मिठी मारली. मुलीचं वैभव पाहून तिचं मन तृप्त झालं. तोंडून शब्द फूटेना. आईनं स्नान केलं. मुलीनं तिला पैठणी दिली: सोन्या-मोत्यांचे दागिने दिले. आईचं रूप अधिकच खुललं. दुपारची वेळ झाली. शामबालेने भक्तिभावानं लक्ष्मीची पूजा केली. आरती झाली. धूपदीपांचा वास दरवळला. शामबालेचा कडकडीत उपवास होता. भोजनाची तयारी झाली. तिनं आईला जेवायला बोलावलं. सुरतचंद्रिका पाटावर येऊन बसली. पण ती एकदम शांत होती. तिला मागचा जन्म आठवला. लक्ष्मीदेवीच्या कृपेने या जन्मी ती राणी झाली होती. ती म्हणाली, “शामा, मी देखील तुझ्यासोबत उपासच करीन!” शामा म्हणाली,”ठिक आहे.“ मार्गशीर्ष महिना होता. मुलीनं चारही गुरुवारी व्रत केलं. ते आईनं पाहिलं. तीही उपवास करू लागली. देवीला भक्तिभावानं प्रार्थना करत होती. महिना संपला. घरी जायचा विचार ठरला. पोहोचवायला शामबाला सोबत गेली.

चार दिवसांनी शामबाला निघाली. मालाधर राजाने पाठविलेला पैशाचा हंडा घेतला. त्यात मीठ भरलं. तो नोकराजवळ देऊन पुन्हा ती सासरी आली. गप्पा मारता मारता वेळ कसा जात होता, त्याचेही भान तिला नव्हते. मालाधरानं विचारलं, “माहेराहून काय आणलसं?” शामबालेनं सोबत आणलेल्या हंड्याकडे बोट दाखविलं. मालाधरानं उत्सुकतेनं झाकण काढलं. त्यात त्याला काय दिसलं? मिठाचे खडे! “अगं वेडे, मिठाचे खडे कशाला आणलेस? इथं मिळत नाही मीठ?” “मीठ मिळतं ना? पण हे मीठ माझ्या वडिलांच्या राज्यातलं आहे. वडिलांचं राज्य सौराष्ट्रात होतं. त्या शेजारच्या समुद्राचं आहे हे मीठ! समुद्रतीरावर दूरवर माझ्या वडिलांचं राज्य होतं. पण आज…” शामबालेच्या सांगण्यातली खोच राजानं हेरली. तो विचारांत गुंगला.

शामबाला म्हणाली, “हे मीठ जीवनाचे अमृत आहे! अन्नाला चव येते ती मिठानंच! मीठ नसलेला पदार्थ अळणी. ज्याचं मीठ खावं, त्याच्याशी इमानी असावं. त्याचं रक्षण करावं. कामात कसूर झाली तर प्रसंगी प्राणही द्यावे.” मालाधर राजा निश्चयाने उठला. त्यानं आपले सेवक सासर्‍याकडे पाठविले. त्यांना बोलावून घेतले.

भद्रश्रवाला काय झालं कळलं नाही. ताबडतोब तो जावयाकडे आला. दोघांची गुप्त बैठक झाली. विचार पक्का ठरला. भद्रश्रवानं अनुमती दिली. मालाधरानं मुख्य सेनापतीला तात्काळ भेटण्यास बोलावलं.

सेनापती आले. त्यांनी मालाधराला वंदन केले. “आज्ञा करावी महाराज” ते म्हणाले. “भद्रश्रवांचं राज्य जिंकलेल्या शत्रूवर ताबडतोब स्वारी करा. प्रत्येक सैनिकाच्या हातावर हंड्यातल्या मिठाचा एकेक खडा ठेवा. शपथ घेवून प्रत्येकाला झुंजायला सांगा.” राजाची आज्ञा झाली. तशी सेनापतीने व्यवस्था केली. दुसरे दिवशी सोबत सेना घेवून बेसावध शत्रूवर चाल केली. शत्रूच्या राज्यावर सारे सैनिक तुटून पडले. मालाधराचे सैन्य बेभान लढत होते. शत्रूसैनिक जमिनीवर कोसळत होते. सूर्य पश्चिमेकडे जात होता. अंधार हळूहळू पसरत होता. शेवटी मालाधराच्या सैन्यानं शत्रूचा फडशा पाडला. अपुर्व विजय मिळविला. भद्रश्रवाचं राज्य पुन्हा मिळवलं.

मालाधराला व शामबालेला ही आनंदाची बातमी सेनापतीने ताबडतोब कळविली. सैनिकांनी शत्रूराज्यातील खजिना लुटला. अफाट संपत्ती मिळाली. ती पोत्यात भरुन मालाधराकडे आणली. त्यात सोन्याच्या मोहरा, बरीच नाणी होती आणि शस्त्रांचा साठाही होता. मालाधरानं भद्रश्रवास सुरतचंद्रिका राणीस घेऊन यायाला सांगितलं. ती आल्यावर घरात आनंदाचं उधाण आलं होतं. तो होता गुरुवार ! शामबालेनं लक्ष्मीव्रताची पूजा केली. आरती झाली. धूप-दीपांचा सुगंध दरवळला. तिनं व तिच्या आईनं उपवास केला. रात्री देवीची आरती झाली. देवीला नैवेद्य दाखवून सर्वांनी पक्वान्नाचं जेवण केलं.

मार्गशीर्ष महिन्यातला हा शेवटचा गुरुवार. लक्ष्मीव्रताचा शेवटचा दिवस. मंगल मुहूर्ताचा दिवस. मालाधरानं भद्रश्रवाचं राज्य त्याच्या स्वाधीन केले. त्यानं या व्रताची सांगता झाली. राजा राणी सौराष्ट्रात आले. सुरतचंद्रिकेनं पुन्हा लक्ष्मी व्रताचा वसा घेतला. तो आजन्म पाळला. घरची स्थिती सुधारली. राजाचे सात पुत्र दुर देशाहून अचानक परत आले. त्यांना पाहून आई-वडिलांना आनंद झाला.

या व्रतामुळे राजा-राणी सुखी झाले. दुःखाचे वादळ सरले. अशी साठा उत्तरांची कहाणी पाचा उत्तरी सुफळ संपूर्ण . सर्वांनी देवीला वंदन करावं. त्यांचं घर सदैव आनंदित रहावे अशी लक्ष्मीदेवीला प्रार्थना करावी.

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हि व्रतकथा वाचताना आजची इंग्लिश शाळेत शिकलेली पिढी कदाचित यावर विश्वास ठेवणार नाही. पण प्रत्येक व्रत कथेत त्या व्रताची महिमा तर सांगितलेली असतेच पण सोबत एक बोध हि असतोच. आता या कथेतच बघा पहिला बोध हा कि कोणतीही गोष्ट शास्वत नसते ती बदलतेच त्यासाठी नशिबाला दोष देण्यापेक्षा सत्कर्म करावेत.

दुसरा बोध हा कि दारी आलेला कोणीही असो, पण त्याच्या सोबत प्रेमाने बोलावे न जाने कोण कसा आहे आणि आपल्याला काय देवून जाईल?

तिसरा बोध हा आहे कि जिथं नाते आहे तिथं एक दुसऱ्याची मदत करणे हे कर्तव्य आहे.

चौथा बोध अगदी सोपा आहे जशी कर्म कराल तसे फळ भेटेल - ये कधीही न बदलणार सत्य आहे. कर्माची फळे कुठल्या रुपात भोगावी लागतील या बद्दल काहीच गणित नक्की नाही पण हे मात्र नक्की तुमचे भोग त्याचवेळी भोगण्यात येऊ लागतात ज्या क्षणी तुम्ही ते कर्म करण्याचे ठरविले असते. 

अशाप्रकारे प्रत्येक कथेत काही न काही बोध आहे जो घेतल्यावर आणि त्यानुसार वागल्याने जीवन नक्कीच बदलते.

तुम्हाला हि कथा कशी वाटली हि comment करून नक्की सांगा. ब्लोग ला फोल्लो करा आणि शेयर करा. अशाच अजून कथा आपल्यासाठी घेवून येउत.







Friday, 22 September 2023

भगवान गणेश से सीखें जीवन जीने का तरीका


🧘‍♂️गणपति गजानंद का स्वरूप ही अपने आप में अनोखा है। गजशीश और मानव शरीर से संयोजित भगवान श्री विनायक अनेक नामों से तो मशहूर हैं ही, साथ में उनका संपूर्ण शरीर ही मैनेजमेंट का जीता-जागता उदाहरण है। इन्हें विघ्नविनाशक, विघ्नहर्ता भी कहा जाता है। यही वजह है कि इन्हें मैनेजमेंट गुरु भी माना जाता है। हम यहां पर ऐसे ही मैनेजमेंट फंडे बता रहे हैं, जो हम गणेश जी से सीख सकते हैं।

बड़ा सिर, बड़ी सोच :-
गणेश जी का बड़ा सिर बड़ी सोच का दर्शाता है। जो इंसान कामयाब होते हैं वे हमेशा बड़ी सोच रखते हैं। मैनेजमेंट में कहा जाता है थिंक बिग। भगवान का शीश हाथी का है। हाथी मूलत: शांत प्रवृत्ति का होता है, लेकिन चतुर होता है। गणपति का गजशीश भी यही प्रतीकता लिए है। सब कुछ समग्रता के साथ सोचें, उस पर मनन करें और फिर क्रियान्वित करें। उसी मूल के कारण हर कार्य में भगवान श्री गणेश को प्रथम पूजा जाता है।

छोटी आंख, पैनी नजर :-
भगवान गणेश की आंखे शरीर की तुलना में छोटी होती हैं। ये पैनी नजर की ओर इशारा करती है। मैनेजमेंट का भी यही फंडा है कि किसी भी फैसले से पहले सभी पहलुओं पर नजर रखें। छोटी आंखें सूक्ष्मदर्शिता का प्रतीक हैं। लक्ष्यपरक दृष्टि से अपने लक्ष्य पर नजर रखी जानी चाहिए, जैसे चील आकाश में उड़ने के बावजूद अपने शिकार पर नजर गड़ाए रखती है और तुरंत झपट्टा मार लेती है। सफल मैनेजमेंट का सिद्धांत भी यही कहता है कि उद्देश्य पर नजर रखें तभी सफलता का स्वाद मिलेगा।

बड़े कान, ध्यान से सुना :-
गणपति के कान विशालकाय होते हैं। बड़े होने के कारण वे हर छोटी-बड़ी बात को सुनने का प्रतीक हैं। अच्छे मैनेजमेंट के लिए भी यही जरूरी है, आप सभी की बात ध्यान से सुनें। ये तभी संभव है जब आप सचेत रहेंगे। जब आप दूसरे को सुनेंगे नहीं, उसके विचारों को जानेंगे नहीं, तब तक आप सफल प्रबंधक हो ही नहीं सकते।

छोटा मुंह, कम बोलो :-
गणपति सकरात्मकता के प्रतीक हैं। संस्थान में यदि आप सकारात्मक रहेंगे तो भगवान श्री गणेश की भांति लोकप्रिय तो रहेंगे ही, साथ एक सफल प्रबंधन भी कर सकने में समर्थ होंगे। एक अच्छा और सफल प्रबंधक वह होता है, जो भली-भांति अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। भगवान गणेश का छोटा मुंह यह बताता है कि बात सोच समझकर बोलें। इंसान को फालतू नहीं बोलना चाहिए।

बड़ी नाक, हालात भांपना :-
सूंड यानी सूंघने की क्षमता, अर्थत हर जगह सजग रहना। हर अच्छी और बुरी चीज को पहचानना। आपकी सफलता काफी हद तक इस बात पर ही निर्भर रहती है कि आपकी ग्रहण शक्ति और पहचानने की क्षमता अच्छी हो। गणपति की सूंड यही सिखाती है। आने वाले हालात को भांपना ही मैनेजमेंट का सबसे बड़ा गुण माना जाता है।

एकदांत, एक लक्ष्य :-
भगवान गणेश से यह भी सीखना चाहिए की किस तरह से मैनेजेंट बैलेंस बनाकर चले। गणपति की नाक के पास उगा एक दांत, जिसके कारण वे एकदंत कहे जाते हैं, वह इस बात का द्योतक है कि मंजिल पर नजर ही एकमात्र लक्ष्य। नाक की सीध में लक्ष्य पर निगाह। टारगेट ओरिएंटेड। एकसूत्रीय कार्यक्रम। यही मैनेजमेंट का भी फंडा है कि टारगेट पर निगाह रखें। भगवान के छोटे पैर बैलेंस का प्रतीक हैं। इससे मैनेजमेंट को संतुलन कैसे बनाना है इसका ध्यान रखना चाहिए।

बड़ा पेट, बातें पचाना :-
भगवान गणेश को लंबोदर भी कहा जाता है। कहते हैं कि किसी भी बात को पचाने के लिए पेट बड़ा होना चाहिए। यदि आप बातों का पचाना जानते हैं तो यह मैनेजमेंट का एक बड़ा गुण माना जाता है। इसे प्रबंधक का खास गुण कहा जाता है। इसका आश्य यह है कि जरा-सी असफलता पर विचलित न हो अपने लक्ष्य से विमुख न हो। उसे सहन करें और अपने लक्ष्य की ओर सतत अग्रसर होते जाएं।



चार हाथ, सभी के साथ :-
भगवान गणेश के चार हाथ हैं। चारों हाथ चार दिशाओं के हैं यानी सफलता प्राप्त करनी है तो चहुंओर या चहुंमुखी प्रयास करना चाहिए। एक हाथ में वे मोदक पकड़े हैं तो दूसरे से आशीर्वाद दे रहे हैं। इसका अर्थ है मैनेजमेंट को सामने वाले से अच्छे संबंध रखने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। सफल प्रबंधन के लिए ये चारों ही हैं।

👉 नियमों का पाश हो, अनियमितताओं पर अंकुश भी हो, श्रेष्ठकर्ता को पुरस्कार स्वरूप मीठा प्रसाद मोदक और कर्मचारियों को कार्य करने की आजादी यानी अभय का अवसर भी। यह भगवान गणेश का प्रबंधन है।

Wednesday, 20 September 2023

तर्पण

एक पंडितजी को नदी में तर्पण करते देख एक फकीर अपनी बाल्टी से पानी गिराकर जाप करने लगा कि.
"मेरी प्यासी गाय को पानी मिले।"
पंडितजी के पूछने पर उस फकीर ने कहा कि.
जब आपके चढाये जल और भोग आपके पुरखों को मिल जाते हैं तो मेरी गाय को भी मिल जाएगा.
इस पर पंडितजी बहुत लज्जित हुए।"
यह मनगढंत कहानी सुनाकर एक इंजीनियर मित्र जोर से ठठाकर हँसने लगे और मुझसे बोले कि -
"सब पाखण्ड है जी
शायद मैं कुछ ज्यादा ही असहिष्णु हूँ..
इसीलिए, लोग मुझसे ऐसी बकवास करने से पहले ज्यादा सोच समझकर ही बोलते हैं क्योंकि, पहले मैं सामने वाली की पूरी बात सुन लेता हूँ... उसके जबाब उसे जबाब देता हूँ.
खैर...  मैने कुछ कहा नहीं .
बस, सामने मेज पर से 'कैलकुलेटर' उठाकर एक नंबर डायल किया... 
और, अपने कान से लगा लिया. 
बात न हो सकी... तो, उस इंजीनियर साहब से शिकायत की.
इस पर वे इंजीनियर साहब भड़क गए.
और, बोले- " ये क्या मज़ाक है..कैलकुलेटर' में मोबाइल का फंक्शन भला कैसे काम करेगा..?
तब मैंने कहा.... तुमने सही कहा...
वही तो मैं भी कह रहा हूँ कि....  स्थूल शरीर छोड़ चुके लोगों के लिए बनी व्यवस्था जीवित प्राणियों पर कैसे काम करेगी 
इस पर इंजीनियर साहब अपनी झेंप मिटाते हुए कहने लगे- 
"ये सब पाखण्ड है , अगर ये सच है.तो, इसे सिद्ध करके दिखाइए
इस पर मैने कहा.... ये सब छोड़िए
और, ये बताइए कि न्युक्लीअर पर न्युट्रान के बम्बारमेण्ट करने से क्या ऊर्जा निकलती है ?
वो बोले - " बिल्कुल ! इट्स कॉल्ड एटॉमिक एनर्जी।"
फिर, मैने उन्हें एक चॉक और पेपरवेट देकर कहा, अब आपके हाथ में बहुत सारे न्युक्लीयर्स भी हैं और न्युट्रांस भी.
अब आप इसमें से एनर्जी निकाल के दिखाइए.
साहब समझ गए और तनिक लजा भी गए एवं बोले-
"जी , एक काम याद आ गया; बाद में बात करते हैं "
कहने का मतलब है कि..यदि, हम किसी विषय/तथ्य को प्रत्यक्षतः सिद्ध नहीं कर सकते तो इसका अर्थ है कि हमारे पास समुचित ज्ञान, संसाधन वा अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं है 
इसका मतलब ये कतई नहीं कि वह तथ्य ही गलत है.
क्योंकि, सिद्धांत रूप से तो हवा में तो हाइड्रोजन और ऑक्सीजन दोनों मौजूद है.
फिर , हवा से ही पानी क्यों नहीं बना लेते 
अब आप हवा से पानी नहीं बना रहे हैं तो... इसका मतलब ये थोड़े ना घोषित कर दोगे कि हवा में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन ही नहीं है.
हमारे द्वारा श्रद्धा से किए गए सभी कर्म दान आदि आध्यात्मिक ऊर्जा के रूप में हमारे पितरों तक अवश्य पहुँचते हैं.
इसीलिए, व्यर्थ के कुतर्को मे फँसकर अपने धर्म व संस्कार के प्रति कुण्ठा न पालें.
और हाँ.
जहाँ तक रह गई वैज्ञानिकता की बात तो.
क्या आपने किसी भी दिन पीपल और बरगद के पौधे लगाए हैं...या, किसी को लगाते हुए देखा है?
क्या फिर पीपल या बरगद के बीज मिलते हैं ?
इसका जवाब है नहीं.
ऐसा इसीलिए है क्योंकि... बरगद या पीपल की कलम जितनी चाहे उतनी रोपने की कोशिश करो परंतु वह नहीं लगेगी.
इसका कारण यह है कि प्रकृति ने यह दोनों उपयोगी वृक्षों को लगाने के लिए अलग ही व्यवस्था कर रखी है.
जब कौए इन दोनों वृक्षों के फल को खाते हैं तो उनके पेट में ही बीज की प्रोसेसिंग होती है और तब जाकर बीज उगने लायक होते हैं.
उसके पश्चात कौवे जहां-जहां बीट करते हैं, वहां वहां पर यह दोनों वृक्ष उगते हैं.
और... किसी को भी बताने की आवश्यकता नहीं है कि पीपल जगत का एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो round-the-clock ऑक्सीजन (O2) देता है और वहीं बरगद के औषधि गुण अपरम्पार है.
साथ ही आप में से बहुत लोगों को यह मालूम ही होगा कि मादा कौआ भादो महीने में अंडा देती है और नवजात बच्चा पैदा होता है.
तो, इस नयी पीढ़ी के उपयोगी पक्षी को पौष्टिक और भरपूर आहार मिलना जरूरी है...
शायद, इसलिए ऋषि मुनियों ने कौवों के नवजात बच्चों के लिए हर छत पर श्राघ्द के रूप मे पौष्टिक आहार की व्यवस्था कर दी होगी.
जिससे कि कौवों की नई जनरेशन का पालन पोषण हो जाये.
इसीलिए.श्राघ्द का तर्पण करना न सिर्फ हमारी आस्था का विषय है बल्कि यह प्रकृति के रक्षण के लिए नितांत आवश्यक है.
साथ ही.जब आप पीपल के पेड़ को देखोगे तो अपने पूर्वज तो याद आएंगे ही क्योंकि उन्होंने श्राद्ध दिया था इसीलिए यह दोनों उपयोगी पेड़ हम देख रहे हैं
अतःसनातन धर्म और उसकी परंपराओं पे उंगली उठाने वालों से इतना ही कहना है कि
जब दुनिया में तुम्हारे ईसा-मूसा-भूसा आदि का नामोनिशान नहीं था
उस समय भी हमारे ऋषि मुनियों को मालूम था कि धरती गोल है और हमारे सौरमंडल में 9 ग्रह हैं.
साथ ही.हमें ये भी पता था कि किस बीमारी का इलाज क्या है.
कौन सी चीज खाने लायक है और कौन सी नहीं.
देश की आजादी के बाद 70 वर्षों में इन्हीं बातों को अंधविश्वास और पाखंड साबित करने का काम हुआ है। अब धीरे-धीरे सनातन संस्कृति पुनर्जीवित हो रही है ।
जय सनातन धर्म     साभार

Monday, 18 September 2023

आसक्ति और देखभाल



👋आसक्ति और देखभाल में अंतर है, अपने शरीर की देखभाल करें, परंतु बिना अपने शरीर से आसक्त हुए, अपने परिवार की देखभाल करें, लेकिन अपने परिवार से मोहग्रस्त न रहें।

जिस क्षण आप देखभाल करेंगे, आप योगदान देंगे; जिस क्षण आप परवाह करेंगे, आप ध्यान से जुड़ेंगे।🫰 जिस क्षण आप आसक्त होते हैं, आपका ध्यान वस्तु पर आरोपित हो जाता है।

आसक्ति आपके उन गुणों की बात करती है जिनका आप पोषण करते हैं; आसक्ति आपके भीतर के निम्न केंद्र की बात करती है। देखभाल आपके अंदर के उच्च केंद्रों की बात करती है। निम्न केंद्र आसक्ति से संचालित होता है जबकि उच्च केंद्र देखभाल ऊर्जा से संचालित होता है।

~भजगोविंदम,
 स्वामी सुखबोधानंद

🙏 

Saturday, 16 September 2023

नशा

*विनाश की जड---नशा !*
सर्वनाश की जड--नशा!
बीमारियों की जड--नशा!
दुर्घटना की जड--नशा!
मूर्खता की जड--नशा!
गुलामी की जड़--नशा!
बुद्धि भ्रम की जड--नशा!
बौद्धिक हानि की जड--नशा!
परिवार विखंडन की जड--नशा!
समाज विखंडन की जड--नशा!

सोचने समझने की शक्ति को नशा
समाप्त कर देता है !
अधिक नशा मनुष्य को मानसिक
रूप से पागल कर देता है!

नशा करने के कारण सर्वाधिक
दुर्घटनाएं होती है!
नशा जिस घर में होता है वहां बच्चों का
बौद्धिक विकास रुक जाता है!

नशा करने वाले मनुष्य के घर में
लक्ष्मी नष्ट होने लगती है!
नशा जिस परिवार और गांव में होता है
वो स्थान दरिद्रता को प्राप्त होने लगता है!

नशा करने वालों की शारीरिक और
मानसिक शक्ति घटने लगती है!
नशा केवल नाश है और कुछ नहीं!
नशेड़ी व्यक्ति को लोग लूट लेते हैं!

नशेड़ी व्यक्ति सबके समक्ष हंसी का
पात्र बन जाता है और वह अपना
सम्मान खो बैठता है!

नशा करने के विषय में ज्ञानियों का
मत ही नशा मति को नाश करता है!
जिस राष्ट्र में राजा और प्रजा नशा करते हैं,
वह राष्ट्र संकट में पड़ जाता है!

सभी दुष्कर्मों की जननी नशा ही है!
नशेड़ी व्यक्ति कभी भी संगठित
होकर कोई कार्य नहीं कर सकते!

नशेड़ियों की संख्या जहां अधिक होती है,
वहां दुर्घटना की संख्या और
संभावनाएं बढ़ जाती हैं !

शराब कीड़ों के मल से बनती है!
शराब पीने वाले अधिकांश लोग
मृत्यु के बाद कीड़ों की योनि में जाते हैं!

शराबी-नशेडी व्यक्ति सदैव ही अपनी
महिला को मारता और पीटता है!
कभी कभी वह विवाद इतना बढ़ जाता है,
कि उस व्यक्ति का परिवार नशे और
शराब के कारण टूटने लगता है!

१०० रोगों को नशा ही पैदा करता है!
नशा मनुष्य को घोर अन्धकार की
और ले जाता है और दु:ख कारी मृत्यु
नशेड़ी को प्राप्त होती है!

नशा करके मरने वाले मनुष्यों को
८४ लाख योनियां भुगतनी पड़ती है!
अगले जन्म में वे भी नशा बनाने वाले
कीड़ों के रूप में जन्म लेते हैं,
क्योंकि नशे के प्रति उनकी आसक्ति
उनको कीड़ों के लोक में भेज देती है!


Thursday, 14 September 2023

मैरी की कहानी

 

मेरी एक सीरियन इसाई महिला थी| केरल के त्रावणकोर में रहती थी| एकदिन उसके डैड गुजर गए| मेरी और उसका भाई उसके डैड के पीछे रह गए| 

अगर मेरी हिन्दू होती तो उसे उसके डैड की संपत्ति में बराबर का हिस्सा मिलता उसके भाई के साथ| पर मेरी तो इसाई थी| इसीलिए उसे उसके डैड के संपत्ति में कोई अधिकार नहीं था| इसाई ब्रिटिश काल में बने कानून के कारण ही मेरी को ये अधिकार नहीं था| 

पर मेरी ने हार न मानी| उसने अपने भाई जोसेफ के खिलाफ मुकदमा दाखिल किया| मुकदमा जिला न्यायालय से सर्वोच्च न्यायलय तक गया| मेरी सर्वोच्च न्यायलय में ये मुकदमा जित गयी| 

इसाई समाज को ऐसी ही महिलाओ की जरुरत हैं जो अपने अधिकारों के लिए अदालत में कई सालों तक अपना मुकदमा लड़ती रहे और अपने अधिकारों की रक्षा करे, भलेही उसे अपने भाई, पति, या किसी अन्य रिश्तेदार के खिलाफ ही क्यों न लड़ना पड़े| 

यह कहानी भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय पर आधारित हैं| आप भी पढ़े और समझे: https://indiankanoon.org/doc/1143189/ 

ए आय संग बाते: #काला_कानून_वापस_लो

#काला_कानून_वापस_लो ये क्यों ट्रेंड हो रहा है? @ grok यह हैशटैग हाल के सुप्रीम कोर्ट फैसले के विरोध में...