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Thursday, 27 March 2025

अग्नि तापलिया काया चि होमे

अग्नि तापलिया काया चि होमे । तापत्रयें संतप्त होती । संचित क्रियमाण प्रारब्ध तेथें । न चुके संसारस्थिति । राहाटघटिका जैसी फिरतां चि राहिली । भरली जाली होती एके रितीं । साधीं हा प्रपंच पंचाय अग्न । तेणें पावसील निजशांती रे ॥१॥
नारायण नाम नारायण नाम । नित्य करीं काम जिव्हामुखें । जन्म जरा व्याधि पापपुण्य तेथें । नासती सकळ ही दुःखें रे ॥ध्रु.॥
शीत उष्ण वन सेवितां कपाट । आसनसमाधी साधीं । तप तीर्थ व्रत दान आचरण। यज्ञा नाना मन बुद्धी । भोगा भोग तेथें न चुकती प्रकार । जन्मजरादुःखव्याधि । साहोनि काम क्रोध अहंकार । आश्रमीं अविनाश साधीं रे ॥२॥
घोकितां अक्षर अभिमानविधि । निषेध लागला पाठी । वाद करितां निंदा घडती दोष । होय वज्रलेपो भविष्यति । दूषणाचें मूळ भूषण तुका म्हणे । सांडीं मिथ्या खंती । रिघोनि संतां शरण सर्वभावें । राहें भलतिया स्थिती रे ॥३॥

यह तुकाराम महाराज द्वारा रचित एक गहन और आध्यात्मिक अभंग है, जिसमें वे संसार के दुखों, कर्मों के बंधन, और मोक्ष के मार्ग का वर्णन करते हैं। वे भगवान नारायण के नाम के जप को मुक्ति का साधन बताते हैं। आइए इसे पद-दर-पद हिंदी में समझते हैं:
मूल मराठी पाठ और हिंदी अर्थ:
पहला पद:
अग्नि तापलिया काया चि होमे । तापत्रयें संतप्त होती । संचित क्रियमाण प्रारब्ध तेथें । न चुके संसारस्थिति । राहाटघटिका जैसी फिरतां चि राहिली । भरली जाली होती एके रितीं । साधीं हा प्रपंच पंचाय अग्न । तेणें पावसील निजशांती रे ॥१॥  
अर्थ: "शरीर अग्नि से तप रहा है और त्रिविध ताप (आधि, व्याधि, उपाधि) से संतप्त हो रहा है। संचित (पिछले जन्मों के कर्म), क्रियमाण (वर्तमान कर्म), और प्रारब्ध (भाग्य) के कारण संसार की स्थिति से छुटकारा नहीं मिलता। जैसे पानी की घटी (घड़ा) बार-बार घूमते हुए भी भरी रहती है, वैसे ही यह संसार एक ही ढंग से भरा हुआ है। इस संसार के पाँच अग्नियों (पंचमहाभूत या दुखों) को साध ले, तभी तुझे आत्मिक शांति मिलेगी।"  
भाव: तुकाराम संसार को दुखों का स्थान बताते हैं, जहाँ शरीर और मन त्रिविध ताप से जलते हैं। कर्मों का चक्र चलता रहता है, और संसार से मुक्ति आसान नहीं। वे सुझाव देते हैं कि संसार की इन "अग्नियों" को नियंत्रित कर ही शांति प्राप्त की जा सकती है।
ध्रुवपद (मुखड़ा):
नारायण नाम नारायण नाम । नित्य करीं काम जिव्हामुखें । जन्म जरा व्याधि पापपुण्य तेथें । नासती सकळ ही दुःखें रे ॥ध्रु.॥  
अर्थ: "नारायण का नाम, नारायण का नाम, अपनी जीभ से निरंतर इसका जप कर। जन्म, जरा (बुढ़ापा), व्याधि (रोग), पाप-पुण्य—ये सारे दुख वहाँ नष्ट हो जाते हैं।"  
भाव: तुकाराम कहते हैं कि नारायण (भगवान) के नाम का निरंतर जप ही सारे दुखों का नाश करने वाला उपाय है। यह अभंग का मुख्य संदेश और ध्रुवपद है, जो बार-बार दोहराया जाता है।
दूसरा पद:
शीत उष्ण वन सेवितां कपाट । आसनसमाधी साधीं । तप तीर्थ व्रत दान आचरण। यज्ञा नाना मन बुद्धी । भोगा भोग तेथें न चुकती प्रकार । जन्मजरादुःखव्याधि । साहोनि काम क्रोध अहंकार । आश्रमीं अविनाश साधीं रे ॥२॥  
अर्थ: "ठंड और गर्मी में, जंगल में रहकर कपट का सेवन करते हैं। आसन और समाधि साधते हैं। तप, तीर्थ, व्रत, दान, आचरण, और विभिन्न यज्ञ करते हैं, मन और बुद्धि से। भोगों का भोग करते हैं, पर जन्म, जरा, दुख, और व्याधि के प्रकार खत्म नहीं होते। काम, क्रोध, और अहंकार को सहन करते हुए, आश्रमों में अविनाश (मोक्ष) को साधो।"  
भाव: यहाँ तुकाराम विभिन्न साधनाओं (तप, तीर्थ, यज्ञ आदि) का उल्लेख करते हैं, जो लोग करते हैं। लेकिन ये साधनाएँ भी संसार के दुखों और कर्म-बंधन से पूरी तरह मुक्ति नहीं दिलातीं। वे कहते हैं कि इन सबके बावजूद काम-क्रोध को जीतकर ही मोक्ष प्राप्त करना चाहिए।
तीसरा पद:
घोकितां अक्षर अभिमानविधि । निषेध लागला पाठी । वाद करितां निंदा घडती दोष । होय वज्रलेपो भविष्यति । दूषणाचें मूळ भूषण तुका म्हणे । सांडीं मिथ्या खंती । रिघोनि संतां शरण सर्वभावें । राहें भलतिया स्थिती रे ॥३॥  
अर्थ: "अक्षरों को रटते हुए अभिमान और विधि-निषेध पीछे लग जाते हैं। वाद-विवाद करने से निंदा और दोष उत्पन्न होते हैं, और भविष्य में वज्रलेप (कठोर बंधन) बन जाता है। तुका कहते हैं कि दोष का मूल भूषण (अहंकार) को छोड़ दे, मिथ्या खेद को त्याग दे। संतों की शरण में पूरे भाव से प्रवेश कर, तभी अच्छी स्थिति में रह सकेगा।"  
भाव: तुकाराम यहाँ शास्त्रों के रटने, वाद-विवाद, और अभिमान की निंदा करते हैं, जो मनुष्य को और बंधनों में जकड़ते हैं। वे सलाह देते हैं कि अहंकार और मिथ्या दुख को छोड़कर संतों की शरण में जाना ही सच्ची शांति और मुक्ति का मार्ग है।
संपूर्ण भाव:
इस अभंग में तुकाराम महाराज संसार को दुखों और कर्मों का चक्र बताते हैं, जहाँ त्रिविध ताप, जन्म-मृत्यु, और भोग मनुष्य को परेशान करते हैं। वे विभिन्न साधनाओं (तप, तीर्थ, यज्ञ) के प्रयासों का उल्लेख करते हैं, पर कहते हैं कि ये भी पूर्ण मुक्ति नहीं देतीं। उनका मुख्य संदेश है कि "नारायण" के नाम का निरंतर जप ही सारे दुखों को नष्ट कर सकता है। अंत में, वे अहंकार और वाद-विवाद को त्यागकर संतों की शरण में जाने की सलाह देते हैं, जो आत्मिक शांति और मोक्ष का सच्चा मार्ग है। यह अभंग भक्ति, वैराग्य, और संत-शरण की महिमा का सुंदर चित्रण करता है।


अगोचरी बोलिलों आज्ञेविण आगळें

अगोचरी बोलिलों आज्ञेविण आगळें । परी तें आतां न संडावें कृपाळू राउळें ॥१॥
जाईल रोकडा बोल न पुसती आम्हां । तुझा तुझें म्हणविलें पाहा पुरुषोत्तमा ॥ध्रु.॥
न व्हावा न वजावा न कळतां अन्याय । न धरावें तें मनीं भलता करा उपाय ॥२॥
म्हणे तुकयाबंधु हीन मी म्हणोनि लाजसी । वारा लागों पाहाताहे उंच्या झाडासी ॥३॥


यह तुकाराम महाराज द्वारा रचित एक भावनात्मक और आत्मनिरीक्षण से भरा अभंग है, जिसमें वे अपनी भक्ति और भगवान के प्रति समर्पण को व्यक्त करते हैं। साथ ही, वे अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए भगवान की कृपा की याचना करते हैं। आइए इसे पद-दर-पद हिंदी में समझते हैं:
मूल मराठी पाठ और हिंदी अर्थ:
अगोचरी बोलिलों आज्ञेविण आगळें । परी तें आतां न संडावें कृपाळू राउळें ॥१॥  
अर्थ: "मैंने अनजाने में आज्ञा के बिना कुछ अनुचित बोल दिया। परंतु अब उसे छोड़ें नहीं, हे कृपालु राउळे (विट्ठल)।"  
भाव: तुकाराम कहते हैं कि उन्होंने भगवान की आज्ञा के बिना कुछ ऐसा कहा जो शायद ठीक नहीं था। अब वे भगवान से प्रार्थना करते हैं कि उनकी इस भूल को नजरअंदाज न करें, बल्कि अपनी कृपा से उसे सुधारें। "राउळे" यहाँ विट्ठल का आत्मीय संबोधन है।
जाईल रोकडा बोल न पुसती आम्हां । तुझा तुझें म्हणविलें पाहा पुरुषोत्तमा ॥ध्रु.॥  
अर्थ: "मेरा सारा बोल (वचन) नष्ट हो जाएगा, हमसे कुछ मत पूछ। जो तेरा है, उसे तेरा ही कहा, हे पुरुषोत्तम, देख ले।"  
भाव: तुकाराम कहते हैं कि उनके शब्दों का कोई मूल्य नहीं है, और वे भगवान से कहते हैं कि उनसे कुछ न पूछें। जो कुछ भी है, वह भगवान का ही है, और उन्होंने उसे भगवान को समर्पित कर दिया है। यह ध्रुवपद (मुखड़ा) उनकी विनम्रता और समर्पण को दर्शाता है।
न व्हावा न वजावा न कळतां अन्याय । न धरावें तें मनीं भलता करा उपाय ॥२॥  
अर्थ: "न होना चाहिए, न बिगड़ना चाहिए, अनजाने में अन्याय न हो। उसे (गलती को) मन में न रखें, कोई अच्छा उपाय करें।"  
भाव: तुकाराम प्रार्थना करते हैं कि उनकी ओर से कोई गलती या अन्याय न हो। अगर अनजाने में ऐसा हुआ भी, तो भगवान उसे मन में न रखें और उसका कोई समाधान करें। यह उनकी नम्रता और सुधार की आकांक्षा को दिखाता है।
म्हणे तुकयाबंधु हीन मी म्हणोनि लाजसी । वारा लागों पाहाताहे उंच्या झाडासी ॥३॥  
अर्थ: "तुकया का बंधु (भगवान) कहता है कि मैं हीन हूँ, इसलिए लज्जित हूँ। हवा ऊँचे वृक्ष को देख रही है (उसे प्रभावित करने की कोशिश कर रही है)।"  
भाव: तुकाराम खुद को हीन और छोटा मानते हैं, जिसके कारण उन्हें लज्जा होती है। वे कहते हैं कि जैसे हवा ऊँचे पेड़ को हिलाने की कोशिश करती है, वैसे ही वे भगवान की महानता के सामने अपनी छोटी स्थिति को देखते हैं। यह उनकी विनम्रता और भगवान के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है।
संपूर्ण भाव:
इस अभंग में तुकाराम महाराज अपनी मानवीय कमियों को स्वीकार करते हैं और भगवान विट्ठल से कृपा की याचना करते हैं। वे कहते हैं कि उन्होंने अनजाने में कुछ अनुचित कहा हो सकता है, लेकिन वे चाहते हैं कि भगवान उसे ठीक करें। वे अपनी वाणी और कर्मों को भगवान को समर्पित करते हैं, यह मानते हुए कि उनका सब कुछ भगवान का ही है। वे खुद को हीन और लज्जित महसूस करते हैं, पर भगवान को अपना बंधु (भाई) मानकर उसकी शरण में सुधार और रक्षा की प्रार्थना करते हैं। यह अभंग उनकी गहरी भक्ति, विनम्रता, और आत्मसमर्पण को व्यक्त करता है।

अग्नि तापलिया काया चि होमे

अग्नि तापलिया काया चि होमे । तापत्रयें संतप्त होती । संचित क्रियमाण प्रारब्ध तेथें । न चुके संसारस्थिति । राहाटघटिका जैसी फिरतां...